बुद्धि नहिए- संतोष कुमार मिश्र

- श्री संतोष कुमार मिश्र

एक बेर यादब लोभ लालच मे
करबौलक बजेट निकासा
अपन जेबी नीक सँ भरलक
तोरलक मैथिलक आशा
कहै हम मैथिल छी।

Santosh Kumar Mishraकवि- श्री संतोष कुमार मिश्र। जनकपुर (नेपाल) निवासी श्री संतोष कुमार मिश्र जी काठमाण्डू (नेपाल) मे एकटा बहुराष्ट्रीय कम्पनी मे अधिकारी छथि। मैथिली साहित्य सँ विशेष लगाव आ मैथिली मे एखन धरि “पोसपूत" आ "उदास मोन” (कथा संग्रह), "एना" (आईना) (सम्पादित कविता संग्रह) आ "एना किए"(कविता संग्रह) प्रकाशित। सम्पर्क- 00977-98510-11940 (मोबाइल)



चारि विदेशी छह गोटे देसी सँ
खतम कएलक सम्मेलन
ककरो चुरा दही, ककरो भात
खतम कएलक अन्वेषण
कहै हम मैथिल छी।

बैनर सेहो गलतीए लिखल
कहै हम छी ठीकदार
लिख लौढा, पढि पाथ र सबहे
बुझै अपना के बुधियार
कहै हम मैथिल छी।

बिना योजना के ओ सम्मेलन
रहि गेल ओ हरमुनिया के धुनि मे
फूटि गेल ढोलक के आवाज संगे ओ
चलि गेल ओ आयोजक के भूर मे
कहै हम मैथिल छी।

श्रवीनमा गंगेशवा जे किछु कएलक
चलि गेल सबहक पेट मे
भाषा पर खोज करौलक
चलि गेल नदी कातक खेत मे
कहै हम मैथिल छी।

नहि त' अपन बापके भेलै
नहि भेलै ओ बेटा के
मात्र किछु बजेटक खातिर
मिथिला परली चपेटा मे
कहै हम मैथिल छी।

नहि त' धोती पहिरौने मैथिल होएब
नहि पाग ककरो पहिराकs
अपनेमे सभ के फोरिक राखत
ल' जाएत सबहे ओ सझियाक'
बुद्धि नहिए, कहै हम मैथिल छी।

ई चिठ्ठी हुनकर नाम

प्रिय संजू!

आइ नञि जानि किएक, अहाँ के चिठ्ठी लिखबाक मोन भऽ रहल अछि। ओना तऽ एहि सँ पहिनेहो कतोक चिठ्ठी लिखने छलहु, मुदा ई चिठ्ठी आन सब चिठ्ठी सँ भिन्न अछि। एहि चिठ्ठी के जखन अहां पढ़ैत रहब, तावेत धरि हम दूर ... बहुत दूर, क्षितिजक ओहि पार जा चुकल रहब। एही लेल जएबासँ पहिने हमर आंतरिक इच्छा छल जे अहाँ सँ भेट करी ... मुदा अपन सोचने थोड़बे होइत छैक ... होबाक तऽ वैह होइत छैक जे भाग्य विधाताक इच्छा रहैत छनि। आइ जेलक चाइर दीवारी में कैद भऽ कऽ ई चिठ्ठी लिखि रहल छी, सब कैदी निन्नमे छथि। अपन वार्ड मे मात्र हमहीं टा एकसरिए जागल छी। संजू ... जेलक जिनगियो बड़ अजीब होइत छैक ...। आंखिक आगू सबटा लहाशे नजरि अबैत अछि। एहिठामक सब आदमीयो एक जीवैत लहाश होइत छैक। कखनो-कखनो तऽ हमरा अपन शरीरो एक जीवैत लहाश बुझना जाइत अछि, साड़ी मे लेपटाएल, छटपाटइत लहाश ...। हम सपनो मे नञि सोचि सकैत छलहु जे एहन दिन देखऽ पड़त। एखनहुं तक बुझाइत अछि जे हम कोनो सपना तऽ नञि देखि रहल छी ...? डराएल सपना ...! मुदा यैह सत्य छैक-एक कटु सत्य!

Satish Chandra Jhaलेखक- श्री सतीश चन्द्र झा,
म.न. 119, क्रॉस रोड, संत नगर
बुराड़ी, दिल्ली- 110084
सम्पर्क- 9810231588


संजू ...! आइ हमरा अहांक स्मरण बड़ आबि रहल अछि। अहां सदिखन कहैत छलहुं ने ... अनुभा अहां बड़ सुन्नरि छी ...! सृष्टि मे अहां सँ बेसी सुन्नरि त कियो छैके नहि ... आ हम लजाइत कहैत छलहुं-धत ... अहां के हरदम एतबे ... मुदा सत्ये कहैत छी-संजू ... यैह सब बात अतीतक स्मरण बनि कऽ रहि गेल अछि। आइ हमरा बीतल बात अनायास चलचित्रक भांति स्मरण होमए लागल अछि...
हमर डैडी द्वारा अहांक अपमान। अहां तऽ जनैत छलियै जे हमर डैडी एक परंपरावादी व्यक्ति छलथिन्ह, समाज नामक कोढि़ के ओ अपन शरीर पर आक्रमण करबाक पूर्ण स्वतंत्रता दऽ देने छलथिन्ह, तखने तऽ ओ हमरा अहांक संग विवाह करबाक अनुमति नहि देले छलथिन्ह, फेर अहां गरीबक बेटा आ हमर डैडी लखपति... केहन विडंबना छल...?
आखिर कहिया धरि परीक्षा होइत रहत गरीबी आ अमीरीक बीच पिसाइत प्रेम के? हमरा मन मे हरदम एहने प्रश्न उठैत रहल छल। फेर एक दिन अहूँ हमरा सँ संबंध तोडि़ चलि गेल छलहु, हम शिकारीक बाण सँ आहत भेल हिरणी जकां छटपटाइत रहि गेल छलहुं। हम राति-राति भरि कनैत रहैत छलहुं अहांक लेल मुदा लाचार छलहुं जे विद्रोह नहि कऽ पाबि सकलहुं। आइयो नारी कतेक बेबस अछि ई बात कियो हमरा सँ पूछए। एहि बातक उत्तर आखिर हमरा सँ बेसी बढिय़ा के दऽ सकतै अछि।

डैडी हमर विवाह एक लखपतिक बेटा जयदीप सँ कऽ देलनि मुदा जयदीप आ हमर कुण्डली हरदम एक दोसराक विपरीते रहल। तइयो हम समय सँ समझौता करैत रहलहुं। जयदीप क्रूर स्वभावक व्यक्ति छल तखनो हम हुनक पूरा-पूरा खियाल रखैत छलियैन मुदा भाग्य के हुनक ई पूर्णता मंजूर नहि छलनि। संभवत: रुपयैवला व्यक्ति रुपैयाक सबसँ बेसी भुखाएल रहैत अछि से हमरा ओही समय ज्ञात भेल छल। सासुरक रहन-सहन सबसँ भिन्न छल। घरक सब सदस्य रुपैया प्राप्त करबा लेल किछुओ करबा पर तैयार रहैत छलाह, तखने तऽ हमरा अपन डैडी के घर सँ लाख-डेढ़ लाख रुपैया मंगबाक लेल पठाओल जाए लागल आ हम अपन डैडीक समक्ष निघोरत भऽ कऽ सब बातक बखान कऽ दैत छलियन्हि, किएक तऽ डैडी जहिया सँ अहां के अपमानित कएने रहथि तहिया सँ हमर हुनका पर सँ विश्वासे उठि गेल छल। डैडी हमर बात के चुपचाप सुनि हमर हाथ पर लाख-डेढ़ लाख रुपैया गट्ïटी दऽ दैत छलाह। ... मुदा ... डैडी के जेना जयदीप सँ धीरे-धीरे घृणा होमए लागल छलन्हि। कारण जयदीप बिना मतलबे हमरा मारहु लागल छल। पराकाष्ठा पर तखन भऽ गेल, जखन डैडी अपन सबटा जमीन-जाल, घर-घराड़ी अपन भगिनाक नामे लिखि देने रहथिन आ एहि संसार के अंतिम प्रणाम कऽ गेल रहथिन्ह। चूंकि हमर कोनो भाई नहि छल एहि दुआरे हमर पति आ हुनक परिवारक अन्य सदस्यगण हमरा सँ लाखोंक सम्पत्ति के आस लगओने रहथि, मुदा एहन नहि होबाक कारणे ओ लोकनि उग्र रूप धारण कऽ लेलनि।

संजू ...! हम अपन कान सँ सुनने छलियै जे ओ सब हमरा मारबाक योजना बना रहल छल। फेर घर मे आबि कऽ हम खूब कानऽ लागल छलहुं मुदा हमर नार पोछनिहार कियो कहां छल ...? एहन मे हमरा अहां बड़ याद अएलहुं संजू ... बड़ याद अएलहुं। मन तऽ होइत छल जे भागि कऽ अहां लग चलि आबि मुदा आगिक समक्ष लेल गेल सात फेराक सप्पत रोकि देने छल।

ओहि राति जखन हम थाकल ढेहिभाएल सुति रहल छलहुं कि जयदीप हमरा देह पर मटिया तेलक डिब्बे उझइल देने छल, हम हरबड़ाकऽ उठि गेल रहि आ लाइटर जरबैत पति के देखि ओहिठाम सँ भागबाक प्रयास करऽ लागल छलहुं, एहि भागम-भागक स्थिति मे सासु हमर साड़ीक खूट के खूब जोर सँ पकडि़ लेने रहथि। हम हुनको धक्का दइत केबार खोलि सड़क पर आबि गेल छलहुं। लेकिन ओतहु हम रुकलहुं नञि, दौड़ैत चलि गेलहुं ... नञि जानि कखन तक दौड़ैत रहलहुं ... तखने हमरा लागल जे हम स्टेशन पर आबि गेलहुं अछि आ बिना बुझने-सुझने सीटी मारैत एकटा गाड़ी पर चढि़ गेल छलहुं।
अंतहीन यात्रा दिस हमर डेग बढि़ गेल छल। गाड़ी रुकल ... खुजल ... रुकल, मुदा हम ओहि मे सँ तखने उतरहुं जत्तए ओहि गाड़ी के अंतिम पड़ाव छलैक। चूंकि हमरा लग टिकट नहि छल ताहि दुआरे हम पकडि़ कऽ जेल पठा देल गेलहुं ...
जेल मे हमरा एकटा महिलासँ परिचय भेल, जे हमरा नारी कल्याण नामक एकटा संस्थाक नाम कहने छल। जखन हम जेल सँ छोड़ल गेलहुं तऽ सीधे ओही नारी कल्याण संस्था गेल रहि, अपन कल्याणक हेतु, मुदा तखन हम ई नञि बुझि सकल छलहुं जे हम एक नर्क से दोसर नर्क मे पहुंचि गेलहुं अछि।

संजू ... जाहि ठोर आ आंखिक प्रशंसा करैत अहां अघाइत नहि छलहुं से आइ वैह ठोर आ आंखि हमर जानक दुश्मन बनि गेल अछि। नारी कल्याणक सचिव हमरा हरदम अपन शरीर केँ बेचबाक हेतु विवश करैत रहैत छल। एक राति तऽ ओ हमरा सामने एकटा हठ्ठा-कठ्ठा खूंखार आदमी के हमर अस्मत लूटबाक लेल कहने छलैक! आ हम कोनो तरहे ओहि ठाम सँ जान बचाकऽ भागल छलहुं।

एहि अंतराल धरि हम भीतरि सँ टूटि गेल छलहुं। मन आजीज-आजीदन भऽ गेल छल, कोनो रस्ता शेष नहि रहि गेल छल तखन हम सीधे थाना पहुंचलहुं आ ओहिठाम अपन व्यथा कथा सुनेलहुं। नारी कल्याणक विरुद्ध रिपोर्टों लिखबएने छलहुं। इंसपेक्टर अवनि सं जखन हम सबटा बात कहलियनि तऽ ओ तुरंते एस.पी. महोदय सँ फोन पर संपर्क केलनि। इंसपेक्टर हमरा संध्या सात बजे एस.पी. महोदयक निवास पर जएबाक बात कहलन्हि। निवासक बात सुनितहि तऽ हमर मन फेर डराऽ गेल छल आ भरिदेह पसेनाक बुन्न छोडि़ देने छल, मुदा ... दोसर रस्तो तऽ नहि छल ... सात बजे एस.पी.क निवास पर पहुंचलहुं।

एस.पी. महोदय बड़ स्नेह सँ भीतरि बजेलन्हि आ बैसबाक इशारा देलन्हि। जाहि स्नेह आ अपनत्वक प्रदर्शन ओ कएने रहथि, ओकरा देखि कऽ तऽ हम एकदम निश्चिन्त भऽ गेल रही, आ पूर्ण सुरक्षित सेहो बुझऽ लागल छलहुं। एस.पी. साहेब सबटा बात के ध्यान सँ सुनने छलाह, मुदा... मुदा किछुए कालक बाद गिरगिट जकाँ रंग बदलऽ लागल छलाह ... आ हमरा लगमे आबि कऽ बैसि गेल छलाह। एकाएक हमरा भरि पाँज ...! हम कसमसाए लागल छलहुं ... ओ धमकी दैत हमरा आत्मसमर्पण करबा लेल बाध्य कऽ रहल छलाह ...। हमर सुतल नारीत्व जागि उठल छल आ हम टेबुल पर राखल तरकारी काटऽवला चक्कू उठा कऽ एस.पी. के डराबए लागल छलहुं ... मुदा हवसक भुखाएल ... मानऽबला कहां छल, ओ हमरा लग अबैत गेल... कि तखने हम पूरा जोर सँ चक्कू ओकर पेट मे घोंपि देने छलियैक ...। नञि जानि कोन दैवीक प्रेरणा हमरा एहन करबा लेल विवश कऽ देने छल। चेतना जखन वापस आएल तऽ हम चिचिआ उठलहुं आ भागबाक प्रयास करऽ लगलहुं, मुदा कतऽ मांगि सकैत छलहुं ...? हम पकडि़ लेल गेलहुं आ हमरा पर मुकदमा दायर कऽ देल गेल, अदालत फांसीक सजा सुनेलक अछि। काल्हिए हमरा फांसी पड़बवला अछि। ऐहन विकट स्थिति मे अहां बहुत याद आबि रहल छी। मधुर स्मृति तऽ सौ वर्षक बादो ओहिना टटका बनल रहैत छैक ने ...?

संजू ... हमरा ज्ञात भेल अछि जे अहां एखन धरि विवाह नहि कएलहुं अछि। की! अहां हमर एकटा बात मानब ...?
विवाह अवश्य कऽ लेब ... आब तऽ अहां के प्रमोशन सेहो भऽ गेल हैत! संजू ... जाधरि अहां विवाह नहि करब ताधरि हमर आत्मा के शांति नहि भेटि पाएत! एक वचन अहां सँ हम आओर लेबऽ चाहैत छी, बाजू पूरा करब ने ...?
अहां अपन पत्नीके खूब पे्रम करबनि। हमरो हिस्साक प्रेम अहां हुनकहि देबनि, जाहि सँ हमर आत्मा सेहो अपन हिस्साक प्रेम पाबि कऽ हरदम अहांक लगेने रहत ... हरदम अहांक लगेने रहत ...।

अहींक अनुभा, सेंट्रल जेल।

अनचिन्हार सन अपन (कथा)- सुभाष चन्द्र

आई संजूक दुरागमन छैक। आईसऽ करीब एक बरिसक पूर्वक गप्प अछि। पोड़का साल बैसाख मे ओकर वियाह भेल रहैक। वियाह मे कतै खुशी रहै, संजूक मोन खुशी सऽ आह्लादित रहैक। विवाह सँ पहिनहि ओ अपन मन-मंदिर मे कतेक सुन्नर वरक कल्पना कयने छल? वियाहक नाम सुनितै ओकर मन रोमांचित भऽ जाइत छलै। वियाह सऽ किछु दिन पहिनहि ओ अपन मामाक डेरा पर दरभंगा मे रहि कय बी.ए. प्रथम वर्षक परीक्षा दय रहल छल आ ओहि क्रम मे ओकर-वियाह ठीक भेलै। वियाह ठीक होबाक प्रत्येक चरण सऽ ओ पूर्णरूपेण अवगत छल। वियाहक दिन सऽ मात्र एक सप्ताह पहिनहि ओ अपन गाम पहुंचल। गाम मे जखन उतरबरिया ओसारा पर ओकर वियाहक गप्प होइत छलै तऽ ओ ओहि बीच सऽ उठि कऽ अपन घर चलि जाइत छल। एवम्ï प्रकारे विघ्न-बाधा के पार करैत ओकर वियाह सम्पन्न भेलै।

Subhash Chandraलेखक- श्री सुभाष चन्द्र,
युवा पत्रकार सुभाष जी पत्रकारिताक संग हिन्दी आ मैथिली दुहू साहित्य मे सक्रिय, एखन धरि दू गोट हिन्दी पुस्तक प्रकाशित आ "कतेक रास बात"क लेल नियमित रुप सँ लेखन आ वर्तमान मे एकर सम्पादक सदस्य सेहो। संगे एकगोट नव मैथिली पत्रिका निकालबा लेल सेहो प्रयासरत। सम्प्रति "प्रथम इम्पैक्ट" नामक पाक्षिक पत्रिका मे कार्यरत आ दिल्ली मे निवास।
सम्पर्क-+91-98718 46705
- सम्पादक।

वियाहक बाद संजू पहिले सऽ बेसी सुंदर जानि पड़ैत छल, ओकर ललाट श्रीयुक्त बुझना जाइत छलै। अपन वर सऽ वैह बेसी सुन्नर व आकर्षक छल। मुदा ओकरा लेल तऽ ओकर पति परमेश्वर छलखिन, ब्रह्मा के लेखा-जोखा मानि कऽ ओ अपन वर के सहर्ष स्वीकार केलक। एखन अपन विवाह सऽ ओकरा कोनो तरहक शिकायत नहि छलै। भऽ सकैछ, मन मे कोनो तरहक बात होबो करैऽ तइयो ओकरा ककरो आगू व्यक्त नहि करैत छल। विवाहक पंद्रह दिनक बाद संजूक वर जीविकोपार्जनक लेल परदेश चलि गेलखिन, जतय ओ काज करैत छलाह। आब तऽ मात्र चिठ्ठी पतरीक सम्पर्क शेष रहि गेल छलै। समय-समय पर पावनि-तिहार मे ओकर वर गाम अबैत छलखिन।

गामक कण-कण सऽ परिचित बीत-बीत जगह सऽ मित्रता ओ अपन मामा आ बाबूजीक दुलारि संजू-के ई गाम घर छोड़ऽ पडि़ रहल छलैक। जहिया ई 'दुरागमन' शब्द ओकर कान मे सन्हिआयल रहै, छटपटा गेल छल संजू। आ छटपटाक रहि गेल छल। खेनाय-पिनाय छोडि़कऽ जठरानलक समान भऽ गेल छल, देहक रौनक जेना समाप्ति भऽ गेल रहै। नेना मे ई शब्द बड़ मनोरंजक आ आनंददायक बुझि पड़ैत छलै। मुदा ई शब्द मे कतेक मारुक वस्तुक समावेश होइत छै, ओहि दिन बुझवा मे आयल रहै। एकर अपन सभ आन भ गेल रहै। सभक मुंह पर खुशी पसरि गेल रहै।

बाबूजीक करेज सूप सन भऽ गेल रहनि। मायक कोढ़ दरकबाक सांती सांठ राजक ओरियान दिस चलि गेल छलै। भैया आ पित्ती लोकनि एहि काजक संपादन मे जी जान सऽ जुटि जेबाक उपक्रम करय लागल छलथिन। आ संजूक देह सुन्न भऽ गेल रहै। ई गाम-घर, लोक-वेद छोड़बाक कल्पना मात्र सऽ ओकर दिमाग अकुलाय लागैत छलै। मुदा जखन ई कल्पना यथार्थ भऽ पछोड़ धेलकै तऽ एकरा किछुओ नञि फुरेलै। कनेकाल मायक मुंह के निहारलक, छोटकी दूनू बहिन आ भाई के सिनेह के टोलक, बाबूजीक दुलार के याद केलक, भाऊजक सानिध्य के टोकलक। तइयो जखन सभ दुआरि फरेबक दुआरि बुझेलै, अपन सभ चिन्हार अनचिन्हार जकाँ लगलै तऽ ओसारा पर सँ उठि गेल।

खेनाय एकदम सँ तिताइन बुझना गेलै। हांञि-हांञि मुंह धोलक। आ घर मे जा अर्राकऽ पलंग पर खसि पड़ल। पुक्की पारि कनबाक इच्छा भेलै। लेकिन कण्ठ सँ आवाज भागल बुझेलै। माय आओर भाउजक पयर छानि पुछबाक मोन भेलै, जे कोन ऐहन अपराध हमरा सऽ भऽ गेलौ भाय! जे एतेऽ निर्मम बनि बैला रहल छैं। कोन ऐहन विभेद भऽ गेल सिनेह मे भौजी! जे अहांक अमृत घोरल बोल लय हम हरिण जकां फिफिया रहल छी? भौजी! अहींक सिनेह सऽ ई गाम छोड़बाक इच्छा नञि भेल कहियो, मुदा ...। अंत मे संजूक करेज दरकि गेलै। कानैत-कानैत गेरुआ भिजा लेलक। लेकिन एकर सभ नोर दूरि गेलै। आई बेस चहल-पहल छै। बरिआती काल्हिं सांझे आबि गेल रहै। आई ई चलि जायत। जँ स्वेच्छा सऽ जेबाक गप्प होइतै तऽ ई किन्नो ने एहन इच्छा करैत। एक दिन जखन अपन अही संताप पर सोचैत बहुत दूर धरि चलि आयल छल तऽ एहि घोंकल परम्परा पर अतिशय तामस भेल रहै। एहनो कतौ उचित छै जे ककरो इच्छाक प्रतिकूल ई समाज अजगर बनल ठाढ़ रहय। भावना के बिसरि जाय! संजू चाहैत छल, बाबूजी के कहियनि जा कऽ जे बाबूजी, दिन फिरा दियौ। जहिया मौन भरि जायत हम स्वत: ककरो बिनु दु:ख देने चलि जायब।

लीक सँ हटि कऽ एते आगू अयबाक हियाब नञि भेलै। कतेको तरहक विचार मे बहैत रहल आ सभक निचोर नोरक रूप मे बहार होइत रहलै। आई भोरे सऽ संजू सभ कथूके बिसरि गेल अछि। हँ, मात्र सूर्यास्तक पश्चात एहि आँगन, एहि परिवार, एहि गाम के छोडि़ कऽ जा रहल अछि। जखनै आईं सूर्यास्त हेतै, संजू एहि जगह के परती-पराँत बना चलि जायत।
एकर दुख एखन नञि छै। ई बिसरि गेल अछि जे एखनै, आइए एकर जीवन मे कोनो नव घटना घटै बला छै। एकटा ओहन घटना, जे ककरो करेज के कनी कालक लेल दरका देतै। टोलक बुढ़-बुढ़ानुस, दाई-माइ लोकनि ऐखन एकर किरदानी पर व्यंग्य-घोरल बोल सऽ आश्चर्य व्यक्त कय रहल छथिन्ह। एकटा बुढ़ही के जखन असह्य भऽ उठलनि तऽ उठिकऽ विदा भऽ गेलीह। आइ अकर ऽ हरऽ कऽ रहलि छै ई छोडि़। ने बरिआती अयलै-तखने हाक उठोलकै, ने आइए संच-मंच भऽ बैसलै। देखह तऽ इम्हर सऽ ओम्हर घुमए अछि। एकटा हम सभ रही जे मास दिन पहिने सऽ छाती फाटैत रहए। आ घर मे गुम-सुम कानैत रही। ... लेकिन ओ बुढ़ही की जानैत छलीह, जे संजूक छाती कतेक फाटैत रहय। हरदम ओ गुम सुम भऽ मन्हुआयल रहैत छल। नहि खेबा मे मौन लगै आ नञि गप्प करबा मे।

किछु वस्तु जात के तकबाक लेल ओ भौजीक दक्षिणबरिया घर सऽ अपन उतरबरिया घर मे हुलि जाइत अछि। लोक सभ थहाथही छै। बरिआती खोयेबाक ओरियान मे सभ पुरुष बाझल छलखिन। एकरा कने संकोच भेलै आ कि किछु मोन पडि़ अयलै, चोट्टे घुमि गेल। तखने ओसारा पर बैसल कियो बाजि उठलै-संजू! कानै कहां छहिन गै? तोरा सऽ बेसी तोहर माय-बहिन कानै छौ? ... संजू के एकाएक जेना ठेस लागि गेलै। मुदा सम्हरि उठलि। भीतर सऽ हंसीक एगो तोर उठलै आ ठोर पर आबि जाम भऽ गेलै।

उत्साह मे वएह वाला वेग आबि समा गेलै। पुनि भौजीक घर दक्षिणबरिया ओसारा पर चलि गेल। कनी कालक बाद ओ भौजीक घर सऽ उठि जाइत अछि। कोनो प्रकारक विचार के मोन सऽ हटा देबाक चेष्टा करैत अछि। अपन दूनू छोटका भाई के तकबाक चेष्टा करैत अछि। आंगन मे कतओ नजरि नहि पड़ैत छै। कि तखने दलान पर ओकर बोल सुनाइ दैत छै। एकर करेज बुझु एकबेर फेरो दरकि गेल होइहि। बेजान ढलान दिस दोगैत अछि। लेकिन ड्योढ़ी लग अबैत-अबैत सभ उपक्रम लूंज भऽ जाइत छै। सभ हुलास मरि जाइत छै।

संजू फेर जेना मुरुझि जाइत अछि। बुझाइत छै, एहि ठाम चारुकात सऽ हमर सभ बाट बन्न कऽ देल गेल अछि। हमर हरेक क्रिया कलाप पर अनगिनत नजरि कें बैसा देल गेल अछि। एकरा बुझना जाइत छै, जे एखन सभक दृष्टि हमरहिं प्रत्येक हाव-भाव पर अटकल छै। हमर एहि प्रकारक किरदानी ककरो सहय नहि भऽ रहल छै। कि तखने छोटका भाय दौडि़ कऽ आबैत एकर दूनू पैर गछारि लैत छै। संजूक चेतना घुरैत छै। छोटका भाय मोनू दीदीक भावना के बिनु परेखतै बिच्चे मे बाजि उठल—'हमरा तोहर बरिआती नञि आबय दैत छलाह, जाऊ हम अहां सऽ नञि बाजब।—मोनूक बोली एकरा थप्पड़ जकां चोट केलकै। मुदा तइयो बात के त'र दैत मोनू के माथ पर हाथ फेरैत दुलार ऽ लागैत अछि। तखने कोनो कोना सँ व्यंग्य घोरल पाँती कान दिस लपकैत छै—'जे बुझाइत नञि छै जे ऐकर दुरागमन छै, कतेक बढिय़ा घुमैत अछि। आई काल्हिंक छहि, ताहिं पिया घर जयबाक खुशी छैक।

एहि बात सुनि कऽ संजूक सोझां कारी चादरि ओलरि जाइत छै। आ दिमाग मे आगि धधक' लागैत छै। सभ किछु छोडि़ उठि जाइत अछि। मौन धीरे-धीरे तिताय लागैत छै। आई भोरे सऽ सब गोटे एकतरफा भऽ गेल छथि। सभक भावना चालनि भऽ गेल छैन्हि। सभक बुद्धि लोढ़ा भऽ गेल छै। ई सब मोन मे अटियाबैत ड्योढ़ी पर सऽ उतरबरिया ओसाराक लेल डेग उसाहैत अछि। पुन: चोट्टे ठमकि जाइत अछि। नजरि कोनियां घरक मुहखर पर जाइत छै, जाहि घर मे माय खेनाय बना रहल छलखिन आओर मायक नोर टप-टप चुबैत छलै। एहि दृश्य के देखि कऽ संजूक धीरज जबाव दय देलकै, ओकर कुहेस फाटि गेलै। सीधे जा कऽ मायक कोरा मे खसि पड़लै। कानैत-कानैत अचेत भऽ गेल, ओकर नोर सऽ मायक नुआ भीज गेलैन्ह। केतबो किओ चुप करेबाक कोशिश करथिन, मुदा ओ चुप होबय वला कहां छल? अंत मे बाबूजी ऐलखिन तखन चुप करोलखिन। हृदय नोरायलै रहैत छै। सोचेत अछि सत्ते हमर सभक इच्छाक कोनो मोल नञि होइत छै। से ऐना कियैक होइत छै? आ धीरे-धीरे सभ हुलास क्षीण होइत चलल जाइत छै। एकर सभ चेष्टा मृत्यु सज्जा पर पड़ल कोनो रोगी जकां होबऽ लागैत छै। किछु करबाक उत्कट इच्छा रहितौ किछु करबा मे असमर्थताक अनुभव करैत रहलि।

आ अही घुन-धुन मे कखन चेतना घुरि अयलै, मोन नञि पडि़ रहल छै। दिन लुक झुक कऽ रहल छै। कि तखने किओ पाछां सऽ ओकर डेन धरैत छै। बड़की काकी छलखिन। काकी बड़की भौजी दिस आग्नेय दृष्टियें ताकैत बाजि उठै छथिन्ह—'अंए ऐ कनियां! कखन कहलौं सभ गहना-गुडिय़ा पहिरा दियौ? एह बाप रे! लाउ, जल्दी करु सात बजेक भीतर विदागिरी भऽ जेबाक छै। ... दलान पर सऽ बड़का कक्का सेहो जल्दी करबाक लेल कहलखिन।

बड़की काकीक बोल सुनिते संजूक बुद्धि निपता भऽ जाइत छै। आँखि सेहो अपन ज्योति चोरा लैत छै। आ बुझाइत छै जे प्राण सेहो संग छोडि़ रहल छै। आओर तकर बाद जे सम्मिलित हाकक आदान-प्रदान शुरू होइत छै, सगरो आंगन बुझु नोराय जाइत छै। संजूक कानब एकटा फराक-सनक स्वर निकालैत अछि, जे स्वर नमहर प्रश्न-चिह्न ठाढ़ करैत छै?

रस्ता

- श्री सतीश चन्द्र झा
आदमी
विचार सँ पैघ होइत छै
वैभव आ अभिमान सँ नहि
जनैत छी
विचारक फुनगी पर

Satish Chandra Jhaकवि- श्री सतीश चन्द्र झा,
म.न. 119, क्रॉस रोड, संत नगर
बुराड़ी, दिल्ली- 110084
सम्पर्क- 9810231588

आदमीक प्रवृति टाँगल रहैत अछि
आ ओकर प्रारब्ध
कर्मक गति तकैत अछि
तत्पश्चात
आदमी, आदमी बनैत अछि।
हम अहाँक उपदेशक नहि
हम त मानधन छी
हमर औकात तऽ
एकटा चुट्टी सन अछि
जकर मालगुजारी
हम अपन शब्दक रूप मे अभिव्यक्त करैत छी।
हमर बात मानब त सुनू
अहाँ अपन मनोवृति के बदलु
एहिठाम अहाँ के सभ किछु भेटत
जकरा अहाँ प्राप्त कए सकी
मुदा भाई लोकनि
रस्ता दूटा अछि
पहिने आश्वस्त भए जाउ
जे कोन रस्ता कतए जाइत अछि।

—सतीश चंद्र झा

मध्य वर्गक सपना

- श्री सतीश चन्द्र झा

भीजि क’ आयल छलहुँ हम
आँखि मे किछु स्वप्न धेने।
मोन के पौती मे भरि क’
स्नेह के संदेश रखने।

किछु कहब हम बात अप्पन
किछु अहाँ सँ आइ पूछब।
फेर हम निष्प्राण भ’ क’
बाँहि मे विश्राम खोजब।

कवि- श्री सतीश चन्द्र झा,
व्याख्याता, दर्शन शास्त्र,
मिथिला जनता इंटर कॉलेज, मधुबनी,
सम्पर्क- +91-97087 15530


पी लितहुँ हम नोर आँखिक
ठोर पर उतरल अहाँ के।
नेह सँ परितृप्त करितहुँ
साटि छाती मे अहाँ के।

ल’ लितहुँ चुम्बन हृदय सँ
गाढ़ रक्तिम ठोर पर हम।
की करै छी ? लोक देखत,
अहाँ कहितहुँ , हँसि दितहुँ हम।

भागि चलितहुँ फेर सँ हम
संग ल’ सुन्दर विगत मे।
कल्पना के पाँखि ल’ क’
उड़ि जयतहुँ उन्मुक्त नभ मे।

होइत जौं ई सत्य सपना
देवता के जल चढ़बितहुँ।
हे प्रिये ! होइतै केहन जौं
किछु समय के रोकि सकितहुँ।

भेंट होइते सभ बिसरलहुँ
हम केना क’ बात मोनक।
छै कहाँ रहि गेल वश मे
स्वप्न देखब मध्यवर्गक।

अछि जतेक सामथ्र्य अप्पन
क’ रहल छी कर्म सभटा।
मोन मे अछि सोच कहुना
किछु रहय बाँचल प्रतिष्ठा।

अर्थ दुर्लभ वस्तु जग केँ
अछि एकर भरि मास खगता।
खर्च बढ़िते जा रहल अछि
बढ़ि रहल दानव बेगरता।

कात मे मुनियाँ कनै अछि
किछु नया परिधान कीनत।
नीक ब्राँडक जींस, जैकेट
पुत्रा बड़का आइ आनत।

माँग छल पायल अहूँ के
मोन मे अछि दू बरख सँ।
नीक कुर्ता लेब हमहूँ
जीब की हम आब सुख सँ।

साग - सब्जीक दाम पुछि क’
होइत अछि परिपूर्ण इच्छा।
जा रहल छी पाँव पैदल,
भाग्य अछि रेलक प्रतिक्षा।

देत के सहयोग अपनो
क’ रहल अछि लोक शोषण।
चीज शौखक अछि सेहन्ता
क’ रहल छी मात्रा भोजन।

नाम सँ के आब चिन्हत
अर्थ केँ सम्मान होइ छै।
झूठ के सम्बन्ध सगरो
के कतय किछु प्राण दै छै।

कामना भगवान सँ अछि
जन्म दोसरो, संग भेटय।
उच्च नहि त’ दीन .. निर्धन
वंश कुल मे जन्म भेटय।

माँटि पर बैसल अहाँ संग
खेल करितहुँ, स्नेह सदिखन।
काल्हि के नहि आइ चिन्ता
छुच्छ जीवन, तुष्ट जीवन।

नांगट जमाय

- श्रीमती कामिनी कामायनी

हकासल पियासल लाल काकी दौडल अयलहि। भट-भट आँखि सँ नोर खसैत, "यै बहिन... कनि चलथुन्ह है... ओझा मौहक नहि करैत छथिन्ह", नूआक खूट सँ आँखि पोछैत बजलीह। त' बहिन आने की पुरैनिया वाली काकी तुरते पएर मे चप्पल पहिर संग धेलिह।

काजक आंगन... भरि आंगन लोक पसरल। सबहक मुँह पर परेशानी... नेना-भुटका के छोडि कय... ओ सब मिलि कय कलोल करय मे लागल छल।

"यै बडकी काकी... कनि अहीं देखियौक... ऊह एहने पर...। कियौ बजने छल...। बडकी काकी माने पुरैनिया वाली काकी... सीधा वर लग कोहबर मे पहुँचली... अन्हार घर मे कोठी लग परहक बिछौन... पटिया पर सतरंजी आ' एक गोट नव चादरि बिछैल... कोहबर मे पुडहैर मे जरैत दीपक मद्धिम सन ईजोत... वर दूहु हाथ सँ गेरुआ केँ करेज सँ दबौने कनी-कनी झूलैत पटिया पर बैसल छलाह। घरक दोसर कोन मे चंगेरा, डाला, पातिल सब राखल। ओसारा पर विधकरि माटिक चूल्हि पर खीर पका क' दूनू थारी मे निकालि नेने छलीह, पितियौत सारि ओहि सँ कनेक फराक ठाम करि क' पिठार आ' सिनूर सँ अरिपन बना कम्बल बिछबैत छल ।

लेखिका- कामिनी कामायनी,
मैथिली, हिन्दी आ अंग्रेजी मे नियमित आलेख आ कविता लेखन,
सम्पर्क- jk_kamayani@yahoo.in


दुनू थारी दुनू दिस राखल जा चुकल छल। गितहारि गीत गाबय लेल झुण्ड मे बैसल बेकल भए गोसाउनिक गीत शुरु कय देने छलीह 'अहिं के पूजन हम अयलहुँ भवानी.......'।

घरक चौखटि पर बैसल बडकी काकी एक नजरि सँ ओसारा आ आंगन दिस देखलन्हि.... आ दोसर नजर सँ वरक दिस। वर लग बैसल दू-तीन टा धिया-पूता केँ भगबैत बजलीह, "जो तू सभ बाहरि खेलि ग, कनि हमहूँ ओझा सँ गप करैत छी"। आ ससरि क' वरक पटिया लग आबि गेलिह।

"ओझा अहाँ कियैक एना घिनौने छी... कतेक बदनामी भए रहल अछि ।" बडकी काकी जे देखय सँ मातबर लागय छलीह, सोनक गहना पहिरने रंग-रूप सँ सेहो। वर कनेक हडबडेलाह... "नै काकी... हमरा ठकल गेल... लडकी बदलि देल गेल... हम त'... हम त'... ।

"की हम त'.. हम त' लगौने छी... आ' लडकी बदलि देल गे से शंका कोना... अहि टोल मे विवाहक जोगरि एक गोट यैएह टा कन्या छल... ओहो अहाँ सँ हजार कच्छ नीक छैक...।" काकी कनेक तमसा गेलीह... "परिछनो काल राति मे अहाँ अहिना घिनौने रही... पूरा समाज देखलक... कियो टीक नोचि लेलकै... कियो बरद कहि देलकै... विवाह करय लोक जायत अछि त' वर के बड बात-कथा सूनय पडैत छै... ई सभ शोभा-सुंदर होयत छै। मुदा अहाँ त' सभ गप पर मारि-पीट करय लेल फाँड बान्हि लैत छी... । अहाँ केँ माय किछु नहि सिखौलन्हि की... उठू.. मौहक करू... बेर शीतल जाय छैक...।

पता नहि की भेलय, जादू वा भूख लागल रहै, वर सत्ते मौहक करय पहुँचि गेलाह... आंगन मे स्त्रीगण सब जोर सँ ठहक्का लगौलक। मुदा वर मुँह नीचा गारने खीर खाइत रहलाह ' खीर खाइयो नै लजाईयो ओझा...' आ हँसी-ठठ्ठाक बीच मौहक भेल।

ई अजगुत वरक खिस्सा गरमी क' दुपहरिया मे खाली समय मे घरे-घर लागल... आ की कुमारि की बियाहल... सब एक-दोसर के कहनाय शुरु केलक ' हे गे अराधना... हे गे सपना, ममता चलबै ओहि टोल... पूनमी के वर देखय...। आ जे कहियो हुनक अंगना मे नहि आएल छल... सेहो सब आयल एहि अजगुत वर के देखए लेल...।

"सभा सँ भेल की घर कथा सँ... " मेहथ बाली जे बडका बेटा लग सँ काल्हिए आएल छलीह पुछलखिन्ह तए लाल काकी बड दुखी भ' बजलथि, "बहिन... घर कथे छै... पिण्डारुछ बला ओझा त' करबेलखिन्ह... लडका नौकरीहारा दिल्ली मे मनेजर छै... लाख टका मे... बेटी रानी बनि क' रहत... कियो मोडि नै दियै... ताहि लेल चुप्पे छलहुँ..."। कनिया के मायक आँखि सँ भट-भट नोर खसय लगलन्हि... त' अपन नवका नूआक खूट सँ आँखि पोछि लेलीह। मेहथ वाली धीरज धरैलन्हि "कथी लेल कानैत छी... आब धिया के जे कपार... जे विधि रचने होयथि... आब हिनके आसीरबाद दियौन्ह... सोना चाँदी त' फेरलो जाए छै मुदा सिन्दूर फेरलो नै जाए... ।"

मेहथ वाली काकी अपन घर आबि गेलीह मुदा मोन मे प्रश्न घुमैत रहलन्हि 'एक लाख मे एहने वर... एक त' कारी धुत्थूर... बडका टीक... नाक प तामस... बाजय के सबूर नहि... कोन मनेजर हेतैक। मोने मोन ओ तर्क वितर्क मे लागल छलीह। कतहुँ सँ बेसी पढल-लिखल नहि लागैत छल। बरातियो मे कोनो जान नै... जे गहना आ वस्त्र कनिया लेल आयल छै सेहो थर्ड किलास...। ओ अपन बहिन धी के फोन लगौलखिन्ह... पिण्डारुछ के छथि जमाय... दिल्ली मे पुलिसक बडका अफसर। अपने उठौलन्हि फोन। "कोन पिण्डारुछ बला के एहि गाम मे विवाह करौलियन्हि ओझा जी... कत्त' मनेजर छै.... । आ सब टा खिस्सा सुनि ओ गुम सुम रहि गेलीह।

दोसर दिन भेने फेर लाल काकी दौडल अयलीह... मुँह सुखैल... हकासल पियासल, "बहिन यै... कहै छैथ ओझा... बिन दुरागमने ल' जायब कनिया के... कनि चलथुन्ह... बडका नाटक शुरु केने छैथ फेर... अंगरेजी मे कीदन कीदन बाजैत छैथ।

लाल काकी के जखन कोनो मोसीबत पडैन्ह तए अपन एहि दुनु पडोसिया के घर जा क' मिनती करय लागथि। लाल कका कमाए लेल कलकत्ता जाए लगलाह त' अपन परिवार के एहि दुनु परिवारक भरोसे छोडने गेलाह। बडकी बेटी के विवाह मे जे कर्ज भेल छलैन्ह से आय पाँच बरखक उपरांत सेहो नै सधल छल। आ ओकरा बाद छोटकी बेटीक विवाहक कर्ज। ओतय हुनक माडवारी मालिक राति दिन खून चूसि चूसि ऋण सधबैन्ह। छोटकी के कन्यादानक पराते जखन बडका कका के दलान पर बरियाती पसरलै छल हुनका कलकता क' गाडी पकरबाक लेल मधुबनी टीसन दिस कएक मोनक पएर नेने प्रस्थान करय पडल छलैन्ह। बेटा सेहो ओहि ठाम काज करैत छल। ओकरा त' बहिनक विवाहक लेल छुट्टी सेहो नहि देलकैक।

मेहथ वाली काकीक बहिनधी सुगन्धाक विवाह पिण्डारुछे भेल छल। ससुर गामक मुखिया छलखिन्ह। चतुर्थीक परात मेहथ बाली काकी जे डील-डौल सँ बेस लमगर आ कनि भारी भरकम छलीह, माथ पर नुआ राखि पान खाइत दुपहरिया मे लाल काकी के आंगन पहुँचल छलीह। असगर घर मे वरक समक्ष बैसि बड महीन स्वर मे पुछलखिन्ह, "ओझा... मधुकर बाबू के चिन्हय छियैक..."।

"हँ काकी, कियैक नहि ओ त' हमर सबहक दियादे छथि। हमर परदादा पाँच भाय आ ओहि मे एकटा ओ सब छथि ।"

"हमर सबहक बड पुरान कुटुम छथि, कनकपुर विवाह छन्हि हमर बहिनक बेटी सँ। मुदा ओहि खानदान मे त' कियो नहि सासुर मे जा क एना उधम मचौने छल। बड भलमानुष लोक सब छथि।" वर एकदम चुप। 'आय धरि कियो वर एहि गाम सँ कोनो बेटी के जबरदस्ती बिन दुरागमन के नहि ल' गेलैए... अहाँ कोना ल' जेबए, उचित लगतैक... । एक सँ एक जमाय अयलाह एहि गाम मे।'

'उचित वा अनुचित की... ।' वर अपन औकात पर उतरि कुतर्क करय लागल 'हमरा संग... ।' "ओझा अहाँ केँ शिक्षा नहि भेटल अछि की बुजुर्ग सँ कोना व्यवहार करबाक चाही... । कनिया के पिता परदेस मे छथि... अडोसिया-पडोसिया संग द' रहल छैन्ह... आ' हुनक माता के अहाँ एना परेसान केने छी... ।"

धड आ माथ झुकौने वर पलथा मारने गुमसुम बैसल छल। वर के पस्त देखैत काकी के मनोबल बढलैन्ह। ओ अपन माथ पर सँ ससरैत नुआ के संभारैत बजलीह, "सब खिस्सा करैत अछि जे वर भंगतडाह छै... कखनो ठक बक चिन्हबा काल मे बकझक... कखनो पान सँ नाक पकरबेबा मे इंकार... ई लच्छन दिल्ली मे मनेजर लडका के लगैत छै। हमरा त' लगैत अछि लडकी बला नीक जेंका ठका गेलाह... कोन कम्पनी मे अहाँ मनेजर छी। की अहाँ के एक लाख दहेज लेबाक चाही।

वर के माथा ठनकलै। ओ माथा उठौलक, 'की हम मनेजर नहि छी...।' लाल टरेस आँखि सँ हुनका घुरैत कनि कडगर आवाज मे बाजल।

"अहाँ मनेजर नहि छी, छोटका-मोटका सेठक फैक्टरी मे चौकीदार छी। हमरा मधुकर बाबू... बहिन जमाए... सबटा कहलन्हि जे अहाँ के नौकरी लगौने छथि... आईये फेल कतओ मनेजर होयत छैक....।" काकी एक-एक शब्द पर अटकैत बजलीह।

आब तए ओकर सिट्टी-पीट्टी गुम। वर टुनटुन बाबू घिघियाय लगलाह, 'काकी गोर लागैत छियैन्ह... हिनक पएर छूबि सप्पत खाय छी... जेना इ कहथिन्ह सैह हेतैक'

मेहथ वाली काकी सहृदय स्त्री छलीह। हुनका व्यर्थ खिस्सा, परनिन्दा करय के आदत नहि छलन्हि। आब वर सरकसक जानवरक जेकां हुनक आदेश पर नाचय लेल तैयार छल। हुनका बड प्रसन्नता भेलन्हि। चलू केकरो कन्या के जीवन सुखी करबा मे किछु त' सहायक भेलहुँ।

"ठीक छै, विवाहक साल भरिक भीतर दुरागमन करब, ता धरि हमरो गाम पर पक्का मकान बनि जायत आ बाबूजी सेहो गामे मे रहताह। बड नीक जेकाँ बोल भरोस दए क' वर टुनटुन बाबू सौसक पएर छुबि विवाहक पन्दरहम दिनक बाद दिल्लीक लेल प्रस्थान करए सँ पहिने अपन गाम जा रहल छलाह।

लाल काकी निश्चिंत आ बेटी सुनन्दा बड प्रसन्न लागि रहल छलीह। सुनन्दा बड सुन्नर त' नहि मुदा अधलाह सेहो नहि छलीह... नव उमरि... नव-नव सिन्नूर माथ पर एकटा विशेष आभा देने छलैन्ह। कनिया सँ विदा होमय काल वरक मुँह पर सेहो विह्वलताक भाव छलैन्ह। कनिया कोठीक पाछां जाकय कानय लागल छलीह।

सौंसे टोल मे की पूरे गाम मे एकटा मेहथ वाली काकी के घर मे फोन छलैन्ह। परदेसिया बेटा सब लगा देने छल। आ' सब किओ अपन फोन सुनए लेल आबैत छल, खास करि क' टोलबईया। वरक पहिल फोनक खबरि सुनि सुनन्दा बिहाडि जेकां दौडल आयल छलीह। मेहथ वाली काकी ओहि कोठरी सँ हटि जाए छलीह... जखन-जखन फोन आबय। बड काल धरि गप्प चलै। किछु चिठ्ठीयो आबय लगलै... एहिना कए दिन बीतैत रहलै। काकी के सब धिया-पूता परदेसिये छलन्हि। बेटी सब अडोस-पडोसक गाम मे नीक घर मे बियाहल गेल छलीह। मुदा सब किओ आब कलकत्ता, बम्बई रहनिहार भ' गेल छलीह। काकी कने व्यापक लोक छलीह। कका जे सदिखन बेरामे रहैत छलाह... हुनक सेवा-सुश्रुषा करैत दिन बड नीक जेकां बीतैत छल। उमिर सेहो पचपन-छप्पन सँ बेसी नहि छलैन्ह। मुदा विधि के विधान की कहल जाए। एक राति सुतलीह त' सुतले रहि गेलीह। भोरे सोर होमय लगलै। बेटा-बेटी हवाई जहाज सँ पटना पहुँचि जेना-तेना जल्दी-जल्दी गाम पहँचलाह। समय पर सबटा काज बड्ड नीक जेकां सम्पन्न भए गेलए।

एम्हर सुनन्दाक विवाहक साल भरि होएबा मे डेढ मास रहि गेल रहै। चिठ्ठी पर चिठ्ठी पठाओल गेल तए सुनन्दाक सासुर सँ दिन सेहो आबि गेल। फगुआ सँ दस दिन पहिने के।

वर टुनटुन बाबू दिल्ली सँ अपन गाम आ गाम सँ दोसरे दिन सासुर। ससुर आ सार सेहो कलकत्ता सँ आबि गेल छलाह। घर मे खूब चुहचुही छलैक। भनसा घर मे तरुआ-तिलकोर छना रहल छल। टुनटुन बाबू के जहिना खबर भेटलन्हि मेहथ वाली काकी गत भ' गेलीह ओ गँहीर स्वांस लैत एकदम्मे चुप भ' गेलाह। कनिया बुझलखिन्ह दुखी भए गेल छथि। काकी छेबो केलखिन्ह बड नीक... केकर नै मददि केने होयतीह... हुनका लग जे अपन परेशानी लए क' जाय... जौं हुनका वश मे होइन्हि तए अवस्से दूर करए के कोशिश करतथि। आ सुनन्दा के त' कतेक बेर अपना ओतए सँ फोन सेहो करए देने छलखिन्ह। कनि काल मे वर घर सँ उठि क' बाहर चलि गेलाह।

कनि देर दलान पर बुलैत-टहलैत टुनटुन बाबू अंगना एलाह। तए सौस के बजा के कहलखिन्ह "विवाह मे तए ई सब ठकबे केलथि... की दुरागमन मे सेहो ठकती...। रंगीन टीवी.. मिक्सी.. स्कूटर.. फर्नीचर.. कत्तो देखाए नहि पडि रहल अछि। दुरागमन मे तए ई सब चीज अवस्से हेबाक चाही नै। बिना एहि वस्तु के दुरागमन केहेन।

लाल काकी अकबकाएल सन रहि गेलीह। दस दिन मे एतेक चीजक जोगाड कोना भ' सकैत अछि। अखने लाल कका कहुना क' किछु पैसा एडभांस लए के कलकत्ता सँ दुरागमन के लेल आएल छलाह। ई साठि-सत्तर हजारक आओर पैंच उधार के देत।

काकी चुपचाप धड खसौने लाल कका लग अपन छोटका दलान पर आबि बैसि रहलीह। कका के ई सब सुनि जेना हाथक तोता उडि गेलन्हि। बड फज्जति करि क' हुनक मालिक पच्चीस हजार अगेवार देने छलैन्ह। अथाह चिंता मे डूबल... जेहो... दू-तीन बीघा खेत छलैक... पहिने सँ भरना छलैक। आब लोक केबाला सेहो करबा नेने छल। बचल घडारी, पैंतालीस धूर.. ईहो बन्धकी लेनिहार एतए के। जौं लईयो लैत अछि तए एतेक पाय कत्त सँ देत। कका कतेक काल धरि दलान पर राखल चौकी पर बैसल रहि गेलाह। बेटा मधुबनी गेल छलैन्ह चीज वोस्त सब बैसाहय। बेर खसैत देखि काकी भानस बनबय लेल आंगन जाय लगलीह तए देखैत छथि... बाडी मे ठाढ बड बेकल भ' मुँह पर नुआ राखि सुनन्दा कानि रहल छलीह। मोन पहिने सँ दुखी... आओर घबरा गेलन्हि। बड्ड सप्पत्त दय पुछलखिन्ह त' बजलीह 'ओ अपन गाम चलि गेलाह, कहलथि जे जा धरि हमरा सबटा सामान नहि भेटत ता' हम दुरागमन नहि करब।'

ओहि राति मे घर मे भानस नहि बनलै। पानिए पीबि कए सब लोक सूति रहल छलाह। एकर बाद कतेक परात भेलए... कतेक दुपहरिया आ राति भेलए...। अनका केकरो सँ एक दिन खबरि भेटलै... टुनटुन बाबू रुसिकए दिल्ली चलि गेलाह। आब नै कोनो चिठ्ठी.. नै फोन...। सुनन्दाक आँखि कनैत-कनैत सदिखन लाल टरेस भेल रहैत छै। मुँह पर जे हरीयरी आयल छलैक सेहो उडि गेलए... मुरझायल सन।

आ बड्ड सोचि विचारि क ' बेटी के दुख देखबा मे असमर्थ बाप एक दिन फेर कलकत्ता दिस पएर बढा चुकल छलाह। सोचने छलथि आब गामे मे रहब। बेटा मुरली सएह ऋण सधौत... मुदा विधिक विधान... टाकाक इंतजाम मे बीमारी आ बुढापा मे हुनका फेर चाकरी करय लेल परदेस जाय पडि रहल छल।

- श्रीमती कामिनी कामायनी
12 अप्रैल, 2009

शरद ऋतु- अमित अभिनन्दन

- अमित अभिनन्दन

शरद ऋतु अछि आयल
सुन्दर गाछक शाख
रंग बिरंगक फूल खिलल अछि
पोखरिक काते कात

खूब लाल अछि फूल बैजयंती
पीयर अछि कनेल
बेला जूही चंपा सभ सं
राह आच्छादित भेल

कवि- अमित अभिनन्दन,
झंझारपुर प्रखण्डक बलियारि ग्रामक निवासी 24 वर्षीय अमितजी पेशा सँ चिकित्सा विज्ञानक छात्र छथि आ संगे-संग साहित्यानुरागी सेहो छथि। सम्प्रति ज. ला. नेहरु चिकित्सा महाविद्यालय, भागलपुर मे अध्ययनरत। कतहु प्रकाशित हुनक इ पहिल रचना छियन्हि।
सम्पर्क- +91-93865 50687

- सम्पादक, "कतेक रास बात"


गाछ सिंघारक खूब फुलायल
सून मुदा अछि आम
आमक डारि पर सजमनि लत्ती
कतेक नीक एही ठाम

दूर दूर तक धानक कोला
हरियर हरियर खेत
बड़का डकहर घूमि रहल अछि
काँकोर लेने पेट

समय सोहावन अति प्रीतिकर
तुंरत धूप फेर छाँव
बीच मेघ में बहुत ऊँच पर
सूर्य जमौने पाँव

बीच पानि में बत्तख दौड़य
काते काते माछ
कमल फूल पर भौंरा उडि उडि
खूब देखाबय नाच

प्रकृति केर ई अनुपम बेला
पंछी गाबय गीत
पीपर तर सं सूरज झांके
धरा लगाबय प्रीत।

अंतिम फेसबुक अपडेट

लेखक: आदि यायावर मूलनाम: डा. कुमार पद्मनाभ पीयूस आफिस पहुँचि गेल छलाह. सबसँ पहिने अपन लैपटॉप खोलि फेसबुक में स्टेटस अपडेट केलाह आ ...