दुनीति केरि पथ मे अछि भाग्य केर गाडी़


कवि- श्री हरिश्चन्द्र झा





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श्री हरिश्चन्द्र झा ’हरि’श्री हरिश्चन्द्र झा ’हरि’ . दरभँगा जिला’क रहनिहार शिक्षक, सन १९९४ सँ सेवानिवृत भऽ गामे मे रहि रहल छथि. प्राचीन समय मे मिथिला मिहिर’क नियमित लेखक छलथिन्ह.

कतेक रास बात परिवार दिस सँ हिनकर स्वागत छन्हि.

--आदि यायावर



दुनीति केरि पथ मे अछि भाग्य केर गाड़ी,

पारे कोना उतरतै चिन्तें शरीर कारी ।



धारा विलोकि विह्वल सुत वृन्द मातृ नोरक

वलिदान केरि वेदी, चढ़िगेल पुत्र कोरक।

प्रलयोक ज्वाल सहि कए दए गेल रत्न भारी,

दुनीति केरि पथ मे अछि भाग्य केर गाड़ी ।



परतरि सभ कहईए हमही विशिष्ट चालक,

रासे धरैत दीरी कि ओ बनैछ घातक।

दिगभ्रान्ति जाल डारए रिपु चालि रुप धारी,

दुनीति केर पथ मे अछि भाग्य केर गाड़ी ।



गीता उठाय बाजए निर्माण नव करब हम,

पथ छोड़ि भऽ कए विचरल करइअए हरदम

रक्षक कहाय भक्षक बनबैत अए बिखारी

दुनीति केरि पथ मे अछि भाग्य केर गाड़ी ।



तन केर चर्म-मान्सो सब खा गेल अछि विदेशी,

बचि गेल अस्थिपँजर चुड़ैत अए स्वदेशी ।

नहि जानि की करत गति स्वार्थ'क बनल पुजारी,

दुर्नीति केरि पथ मे अछि भाग्य केर गाड़ी ।



नायक बनल कहइए बढ़ि केँ सजाऊ उपवन,

विष वृक्ष केँ उखारु रोपु अशोक चन्दन।

विरर्रो उठा अशान्तिक शान्तिक'क कटैछ झाड़ी,

दुनीति केर पथ मे अछि भाग्य केर गाड़ी ।



दए क्रान्ति केर शिक्षा पथ मे रखइ अए,

सुख शान्ति ज्ञानहुक गृह धू-धू शतत जरै अए।

जनु दूत भऽ विदेशी'क बनबए भविष्य कारी,

दुनीति केरि पथ मे अछि भाग्य केर गाड़ी ॥



हे माएक सपुते पुनि दान मा मँगै छथि,

दसकँध आओर कँसक बलिदान मा मँगे छथि ।

बनु चन्डिका बहिन सब घरि बन्धु मुन्ड्धारी,

दुनीति केर पक्ष मे अछि भाग्य केर गाड़ी ॥

गरिमा आ पलास (भाग-४)

कथा, भाग-4: लेखक:- आदि यायावर, मोडेरेटर: केशव कर्ण (समस्तीपूरी)

एखन धरि पढ़लौंह, "बचपन से तरुनाई धरि संग चलनिहार गरिमा आ पलासक सतत प्रेम, तमाम वर्चस्व आ विषमताक कात करैत जीवन पथ मे दुन्नु लोकनिक संग आनि देल्कैन्ह! फेर अहम् आ स्वाभिमानक द्वंद, दाम्पत्य जीवन मे करवाहट आ एक छत कें नीचा एकाकी जीवैत दू प्राणी जे, जिनगी भरि संघ चलबाक शपथ नेने छथि. गरिमा’क माए बाबुजी केँ पहिने सँ एहि प्रेम विवाह मँजूर नहि छलैनि. फेर गरिमा-पलास’क सँवादविहीन जीवन, गरिमा’क बीमारी... आब आगा पढ़ल जाऊ, आदि यायावर जीक शब्द मे... !!

फोन राखि, गरिमा सीधे अपन बेडरुम मे गेलीह आ पलास किचेन मे. गरिमा’क माए बाबुजी सब किछु देखि रहल छलैथि. सासु ससुर भेला’क कारणेँ हुनका लोकनि केँ पलास’क किचेन जेनाय नीक नहि लागि रहल छलनि. मुदा हुनका दुनू लोकनिक सँवादहीनता’क स्थिति मे पलास’क किचेन मे घुसनाय, एक सुखद आश्चर्य लागैत छलन्हि. नहि जानि दुनू व्यक्ति’क मुड केहेन छलनि, तेँ पलास केँ एना करबा सँ रोकि नहि सकलैथ. जाबए धरि मे गरिमा बेडरुम सँ बाथरुम जाए फ्रेश भऽ केँ बहरेलीह, ताबय मे पलास चारि कप गरमागरम काफी बना केँ तैयार छलाह. एकटा ट्रे मे लऽ केँ पहिने अपन ससूर, सासु, फेर गरिमा केँ दऽ केँ बाँकी बचल एक अपन आ लेल राखि, सोफा पर पसरि गेलाह. सब किओ चाय पीबि रहल छल, मुदा बाजि किओ नहि रहल छल. एक घर मे चारि लोक एकेठाम बैसल मुदा घर मे शाँति, नीरवता, आ आँशका सँ धड़कैत दू जोड़ी हृदय. सब लोकनि केँ एक दोसर सँ बहुत किछु कहनाय छलनि, मुदा बाजैत किओ नहि. पलास स्थिति केँ सामान्य करबा’क लेल टीवी आन कऽ केँ न्यूज लगा देलथिन्ह.

पलास’क किचेन मे गेनाय, काफी बना केँ आननाय, आ फेर पहिने टीवी खोलनाय आ गरिमा’क एको बेर नहि मना करनाय एक बात केँ प्रदर्षित करैत छल, जे हुनका दुनू लोकनि मे कटुता अवश्ये कम भऽ गेल छन्हि. अन्यथा, गरिमा पलास केँ काफी बनबे नहि देने होयत. अक्सर होइत छैक, जे दू पति-पत्नी मे यदि प्रेम अछि तऽ कोनो काज केँ एक दोसरा’क उपर मे टालि देबाक कोशिश काएल जाइत छैक. आ दुनू’क बीच मे लड़ाई झगड़ा भेला’क बाद स्थिति एहेन होइत छैक, हम काज करब तऽ हम. पति पत्नी दोसर’क हिस्सा वाला काज काए, अपन जीवन सँगी’क उपर मे दबाव बनेबाक कोशिश करैत छैक. एखन गरिमा पलास केँ एको बेर किचेन मे जाय सँ मना नहि केने छलन्थिन्ह. ई बात गरिमा’क माए बाबूजी केँ बहुत नीक लागि रहल छलनि.

कनि देर न्यूज चलैत रहल, फेर गरिमा के बाबूजी चुप्पी तोड़ि माहौल केँ सहज करबाक कोशिश केलथिन्ह. ओ पलास सँ पुछलथिन्ह, "गरिमा केँ डाक्टर की कहलकन्हि?"

"से गरिमा सँ पुछि लिऔक ने?", गरिमा’क दिस कनखी आँखि सँ देखैत पलास बाजल.

"मुदा हम तँ अहीँ सँ सुनय चाहैत छी" गरिमा’क बाबुजी जोर दैत पुछलथिन्ह.

पलास एक बेर गरिमा’क दिस ताकैत बाजए लागल, "बाबुजी! अहाँक बेटी केँ भूख’क बीमारी छनि. डाक्टर अपन भाषा मे कहलकन्हि, जे हिनका एनिरेक्सिया-सिन्ड्रोम छन्हि"

एकर मतलब ई, अपन सखी सहेली केँ देखाबैक लेल अहाँक बेटी हरदम दुबर पातर रहय चाहैत छथि. तेँ खेनाय पीनाय छोड़ि ओ डायटिँग’क पाछु लागि गेलैथ. बेसी डायटिँग केला सँ एनिरेक्सिया-सिन्ड्रोम भऽ जैत छन्हि. आब हिनका खेबा पीबाक आदति छुटि गेलनि. भूख बिल्कूल नहि लागैत छन्हि. डाक्टर अपन भाषा मे एकरा एनिरेक्सिया-सिन्ड्रोम कहैत छैक. आ दबाई मे कहलकन्हि ये जे चारु टाइम ठुसि के खेबाक लेल. ओना मोन बहलेबाक लेल एक पुष्टाय से देने छन्हि. कहलकन्हि ये एक-एक मुन्ना तीन बेर पीबाक लेल". पलास अपन बात खतम करैत सासु दिस देखय लागल्थिन्ह. आ गरिमा मुड़ी झुकाय, लजाएल एक कोन मे बैसल छलीह.

"बाप रे बाप केहेन दुनियाँ आबि गेल छैक. गरीब लोक भूखल मरैत छैक आ जकरा लग सब किछु छैक हुनका ओ भूखल रहि भूख केँ मारि दैत छैल." एक दम्म मे गरिमा’क माय हुनकर बाबुजी केँ कहि देलथिन्ह. गरिमा’क माए हुनकर बाबुजी केँ बहुत देर देखि रहल छलीह आ बिना मुँह खोलने आँखि सँ कहि रहल छलीह जे हम कहैत छलहुँ ने, "जे बेसी गलती अपने बेटी’क अछि". आ हुनकर बाबुजी चुपचाप बात मानि गेल छलाह.

गरिमा आ पलास बहुत दिन सँ एक दोसर सँ अलग रहि खुश नहि छलैथ. गरिमा केँ होइत छलनि जे हुनकर कोन गलती. आई कोनो पुरुष घर पर रहए वाली अपन स्त्री केँ यदि डाँटैत छथि, हरदम अपन नौकरी करबा’क दम्भ दैथ छथि तऽ बड्ड नीक, मुदा आइ हम दिन भरि खटि के जँ आबैत छी, आ साँझ केँ अपन पति सँ किछु नीक बेजाय कहैत छिअनि तऽ बड्ड खराप?

पलास केँ से बहुत दिन सँ किछु नीक नहि लागैत छलनि. अपन सबसँ प्रिय वस्तु सँ अलग भऽ ओ खुश नहि छलाह. बहुत दिन सँ आत्म मँथन करैत छलाह. आ निर्णय पर पहुँचलाह जे हुनकर पत्नी’क कोनो दोष नहि. हँ हुनकर बाजए के तरीका नीक नहि छन्हि. तेँ डाक्टर लग गेला सँ पहिने, अपन मोन’क बात गरिमा सँ कहि देलथिन्ह.

अपन गलती केँ स्वीकार करबा’क कारनेँ पलास’क गप्प, गरिमा केँ नीक लागलन्हि. बल्कि पलास’क झुकबाक देरी छल. गरिमा अपने झुकि गेलीह. ओकर बाद डाक्टर लग जेबा सँ पहिने आ ओकर बाद अपन पछुलका जीवन’क उल्लासमयी प्रेम प्रसँग याद कऽ ओ फेर सँ एक दोसर दिस समर्पित होएबाक कोशिश करए लागलथिन्ह.

एकटा समाधान दोसरो समस्या केँ हल कऽ दैत छैक. तेँ गरिमा’क मुँह सँ जँ हठाते निकललन्हि, "अहाँ बिजिनेस किएक नहि करैत छी. हम लोन लऽ अहाँक लेल किछु पूँजी’क व्यवस्था कऽ दैत छी" तँ पलास एक्के बेर मे मानि गेलाह. वस्तुतः बिजिनेस’क बात सुनि हुनका लोकनि’क प्रत्येक समस्या’क समाधान भेट गेल छलनि.

फेर सँ घर मे स्तब्धता पसरि गेल. मुदा पछिला किछु देर सँ पलास’क कटाक्ष सुनि गरिमा’क माए बाबुजी केँ बहुत किछु पुछबाक मोन केलकन्हि. मुदा नहि जानि किएक हुनका पलास’क कटाक्ष नीक लागलनि. आ गरिमा’क चुप मुँह आ लजाएल आँखि हुनका पूर्ण रुप सँ निश्चिँत कऽ देने छलन्हि. एखन पलास एहि बात’क बाट ताकि रहल छलाह जे गरिमा कखन किचेन मे जाए खाना’क व्यवस्था करैथ. कहीँ आई काफी’क सँग खाना बनबे नहि पड़ि जान्हि, से सोचि ओ आतुर होइत छलाह. ओ फेर सँ गरिमा दिस ताकि रहल छलाह. आ गरिमा जानि बुझि केँ अनठेने छलीह. आँखिए सँ कहि रहल छलीह, "एक दिन खाना बना देब तऽ कोनो पहाड़ नहि उनटि जायत". नहि जानि किएक गरिमा’क लाज कतय पड़ा गेल छलन्हि.
समाप्त
एहि कथा’क समाप्त भेला सँ तथाकथित इतिहास बनि गेल. आब बाट ताकि रहल छी ओहि दिन’क जखन दोसर मैथिली ब्लोगर अपन ब्लोग मे इएह इतिहास रचि, ब्लोग’क तारीख चेन्ज कऽ केँ क्लेम करैथि जे साबुदायिक कथा लिखय वाला ओ पहिल व्यक्ति छथि.
कथा'क      प्रथम भाग ।  दोसर भाग  । तेसर भाग  ।  चारिम आ अंतिम भाग

अगिला कथा’क शुरुआत करबाक लेल लेखक गण आमन्त्रित छथि

घिढारी के मंत्र

आदरणीय पाठक गण,
किछु सामयिक व्यस्तता आ किछु तकनिकी अव्यवास्थाक कारण
हम अहाँ लोकनिक "गरिमा आ पलास" कें अगिला भाग ससमय नहि उपलब्ध करएबा हेतु
क्षमा-प्रार्थी छी. हम शीघ्रे कथाक अगिला भाग सँ अपने लोकनिक रु-बा-रु करएबाक वचन
के साथ विजय दशमी पर अपने लोकनिक मनोरंजन हेतु लए क' आएल छी एक
गोट पुरान गप्प. पढू आ प्रतिक्रया दए उत्साह-वर्धन करू !
दुर्गा पूजाक शुभ कामनाक साथ,
- करण समस्तीपुरी
हंसियों

मजाक मे सीखल बात कखनो-कखनो कतेक मर्मान्तक उपयोगी भ' जाएत छैक, एहि बातक प्रतीति हमारा स्नातकक अन्तेवासी छात्र जीवन मे भेल. स्कूल मे पंडीज्जी माट साब जेखन शब्द-रूप यादि कराबैथ तहन मोने मोन कतेक अपशब्द कहिऐन्ह ! 'लट-लकार' महा-बेकार आ 'लंग लकार' भंग डकार बुझाए ! मुदा 'हर' धातु के क्रिया-रूप ख़ास कए प्रथम पुरुष मे - "हरामि हरावः हरामः'' खूब मोन से पढ़ब करिऐक ! स्वाइत अगिला पांति के जोरगर आवाज बुझि मास्टर साहेब के भेलैन्ह जे संस्कृत मे चटिया सबहक खूब अनुरक्ति अछि. आ हमहु सभ गुरूजी के ई आभाष नाहि होमए दिऐक जे ई "हरामि हरावः हरामः'' के अखंड जाप संस्कृत मे अभिरुचि छी कि महज एक स्वांग ! खैर, गुरूजी गेला कहि, आ चेला गेल बहि ! मुदा बहैतो-बोहाएत किछु विद्या त' रहिये गेल. ओना साहित्य से व्यक्तिगत रूपे हमारा तखनो लगाव छल. तैं "येनांग विकार तृतीया" भन्ने नहि बुझिऐक मुदा "राजद्वारे श्मशानेच यः तिष्ठति सः बान्धवाः" वाला फकरा आ "कार्येषु दासी कर्मेषु मंत्री ! भोजेषु माता शयनेषु रम्भा" वाला श्लोक ने यादि करए मे कोनो आलस आ नहि ओकर अर्थे बुझाए मे कोनो खोंखी !! करत-करत अभ्यास ते संस्कृत के किछु श्लोक ता एना रटा गेल जेना गामक झगरा मे जनि जाति गारि पढैत अछि! एहि तरहे स्कुलिया शिक्षाक मेट्रिक घाट पर कात लगा कालेज मे विज्ञान संकाय मे दाखिल भेलौंह ! फेर त' दू-तीन साल धरि संस्कृत से नहि कुनो भेंट आ नहि कुनो बात ! मुदा साहित्यक मोह स्नातक मे फेर अपना दिस झीक लेलक ! तदुपरांत त' एकर रसास्वादन करैते छी !!
तखन हम स्नातकोत्तर प्रथम वर्ष मे छी आ झा जी स्नातक अंतिम वर्ष मे ! दुन्नु लोकनि साहित्य के छात्र ! साहित्य, साहित्यकार, पत्रकार, सामाजिक सरोकार आदि विषयक नित्य सांझ मे होए वाला परिचर्चा से मैत्री प्रगाढ़ होएत गेल. हाँ ! दुन्नु आदमी मे एक गोट और समानता अछि - आर्थिक रूप से कमजोर पारिवारिक पृष्ठ-भूमि ! ओहि ठाम झा जीक किछु पूर्ण-कालिक आ किछु सामयिक यजमान सेहो छथि जतए से पूजा-पाठ, विधि-व्यवहार, संस्कार आदि से आबए वाला दक्षिणा झा जी लेल त पैघ सहारा छैन्हे बरमहल हमरो सभ के सिंघारा-लिट्टी के जोगार अछि! लगनक समय मे झा जीक व्यस्तता किछु विशेष बढि जाएत छैन्ह ! वर्तालापक क्रम मे हम्मर संस्कृत उच्चारण से प्रभावित ओ पूजा-पाठ मे हमर सहायता सेहो लैत छथि! हमरो विनोदी मोन के ई काज एक टा अद्वितीय मनोरंजन बुझाएत अछि !
ऐंह .... अजुका लगन त बड़ जोरगर छैक ! भिनसरे अन्गैठी लैत झा जी कहि रहल छथि... दिन मे मगरदही मे एक गोट जनेऊ करेबाक अछि, फेर थानेश्वर थान मे एक-गोट व्याह आ राति मे फेर काशीपुर मे विवाह !!! कहै छैक नहि, ‘भगवान दैत छथिन्ह त' छप्पर फारि के....’ से झा जीक मुँहक बात खतमो नहि भेलैन्ह कि एक गोट आओर यजमान पहुंचि के अनुनय विनय कए रहल अछि ! पंडी जी, काल्हि हम्मर बेटी के लगन छैक आ आई पूजा ! मुदा पूजा कराएत के ? आई त झा जी पहिनहि ब्लैक मे बुक छथि ! झा जी हमारा पुछैत छथि ! हमहूँ हंसिये मजाक मे राजी भ' जाएत छी ! सांझ मे फेर यजमान बजाबए लेल आबैत अछि ! आई हम्मर संस्कृत ज्ञानक 'अग्नि-परीक्षा' अछि ! तें किछु घबराहट त' अछि मोन मे मुदा प्रकट नहि करैत छी ! हाँ, झा जीक डेलबाह सेवकराम के सभ किछु बुझल छैक ! ओ हमारा साथे अछि ! से किछु भरसाहा अछि !
एम्हर जा धरि हम हाथ पैर धोवैत छी, ओम्हर सेवक सभ जोगार केने तैयार अछि ! हमहूँ झट याजमानक चुरू मे पानि दए, "अपवित्रः पवित्रो वा... पढ़ाबैत पान सुपारी कलश-गणेश कए फट से "एकदा मुनयः सर्वे.... से होएत 'लीलावती-कलावती कन्या...' के कथा कहैत "ॐ जय जगदीश हरे...." करवा दैत छी ! एम्हर हम अप्पन पोथी पतरा समेट रहल छी कि एक झुंड जनि जाति आबि के पंडी जी ओम्हर चलियऊ ! आब ओम्हर चलियऊ के शोर करब शुरू कए दैत अछि ! हम पुछैत छी, "आब ओम्हर कि छैक ? पूजा त' भ' गेल... छुटैते महिला मंडल के मुखिया उपहासपूर्ण स्वर मे कहैत छथि, यौ पंडी जी ! त' घिढारी नहि करेबैक ? ले बलैय्या के... आब त' फँसि गेलौंह... ओ त’ सत्य-नारायण कथाक पोथी छल त' पढि देलियैक... आ अब घिढारी की होएत छैक ? एक बात त' बुझैत छियैक ने, लगन मे उमताएल मिथिलानी के सभ से चोटगर निशान पंडीये जी पर पड़ैत छैक ! से हमरा मौन देख ओ सभ रसगर व्यंग्य-बाण छोड़ी रहल छथि ! हमरा मोने मोन झा जी पर तामस उठि रहल अछि, 'ओ हमारा कहलथि ने किए जे एतय घिढारियो छैक...' !! मुदा एखन त' सभ से महत्वपूर्ण अछि ई यजमानीक जाल से निकलनाय ! खैर जल्दबाजी के अभिनय करैत हम कहैत छी " जल्दी घिढारी के तैय्यारी करू नहि त हमारा छोडू... दोसरो ठाम काज अछि!" कहि त देल मुदा आब की ? हमरा त एहि विषय मे किछु बुझि नहि ! फेर ध्यान आएल, जे कतेक रास लगन व्याहक खेलल सेवक त' हमरा संघे अछि, तहन एकरे से मंत्रणा कएल जाए ! सेवक हमारा घिढारी के विध बता कहैत अछि जे जाऊ ने किछु पढि देबैक... के बुझैत छैक... !! मुदा हमारा लग यक्ष प्रश्न छल कि पढ़ल कि जाए ! इएह उहा-पोह मे ओम्हर सभ तैय्यारी कए जनि-जाति गीत-गारि गाबैत पंडी जी के शोर क' रहल छथि ! हमरा ई चारि डेग चारि कोस लागि रहल अछि ! खैर ... ओतहुका सिचुएशन पर आधारित चट-पट एक टा मंत्र गढैत छी! कन्या आ कन्याक माता-पिता घी लेने ठाढ़ छथि आ आब गोबर के बनल गोसाईं पर ढारता ! ओम्हर विधि चालू होएत अछि आ एम्हर हम्मर मंत्र,
"माता सहित पिता पुत्री ! घृत धारम खरा-खरी !!"
यजमान हमरा साथे-साथ पॉँच बेर इएह मंत्र के दोहराबैत छथि. हतप्रभ गीत-गाईन सभ प्रशंसाक दृष्टि से देखैत छथि, स्वाइत पहिल बेर हुनका लोकनिक गिढारीक मंत्र बुझि मे आबि रहल छैन्ह... सभ किछु सकुशल, सानंद संपन्न ! हमहू यथेष्ट दक्षिणा आ सम्मानक संग बिदा होएत छी ! त' आब कहियौ, सत्ये ने... "हंसियों मजाक मे सीखल बात कखनो-कखनो बड़ उपयोगी भ' जाएत छैक !"
- करण समस्तीपुरी

गरिमा आओर पलास

कथा, भाग-3: लेखक:- सुभाष चन्द्र, मोडेरेटर: केशव कर्ण (समस्तीपूरी)

एखन धरि पढ़लौंह, "बचपन से तरुनाई धरि संग चलनिहार गरिमा आ पलासक सतत प्रेम, तमाम वर्चस्व आ विषमताक कात करैत जीवन पथ मे दुन्नु लोकनिक संग आनि देल्कैन्ह! फेर अहम् आ स्वाभिमानक द्वंद, दाम्पत्य जीवन मे करवाहट आ एक छत कें नीचा एकाकी जीवैत दू प्राणी जे, जिनगी भरि संघ चलबाक शपथ नेने छथि... आब आगा पढ़ल जाऊ, सुभाष जीक शब्द मे... !!


घर मे बीमार पत्नी आ हुनकर सेवा-सुश्रुषाक लेल आयल सास-ससुर, पलासक लेल दूनू पटुआक साग जेकाँ। शरीरक लेल जहिना पटुआक साग शीतलता प्रदान करैछ ओहिना सासुरक माहौल नीक लगैत अछि, मुदा ई साग कनी अधखाइन (तीत) लगैत अछि। एखनुका समय मे पलासक लेल गरिमा आ हुनक माय-बाप सेहो ओहिना लगैत छलखिन्ह। जाधरि सास-ससुर नहि छलाह, कम सँ कम गरिमा के ऑफिस गेलाक बाद पलास घर मे एकसरि बैसि अपन संताप त' मिटाबैत छलाह। मुदा आब... कतय जेताह? कोनो ठेकान कहां छैन्हि? घर मे भरि दिन रहताह त भरि दिन गरिमा हुनक सामने रहथीन्ह। आ सास-ससुर के कि जबाव देताह? एहि गुन-धुन मे पलास भोरे नियत समय पर घर सँ विदा भ जाइत छलाह आ साँझ भेला पर घुरैत छलाह।

दिन पर दिन बीति रहल छल। मनुष्य के स्वभाविक गुण होइत छै जे जाहि सुख के ओ एक बेर प्राप्त कय लैत अछि, ओकर पुनरावृत्ति बेर-बेर चाहैत अछि। संगहि समाजक ताना-बाना एहि प्रकारक अछि जे पुरूष सहजहिं महिला कें अपना सँ आगां बढैत नहि देखि सकैत अछि। पलासक संग सेहो इएह कारण छल। पुरूष होबाक दंभ मे ओ गरिमा के कतेको नीक-बेजाय कहि देलखिन। गरिमा सेहो भावावेश मे उच्छट बात सुना देलखिन्ह। गरिमा के स्वास्थ्य ठीक नहि भ रहल छल। शारीरिक सँ बेसी मनक संताप घर कय चुकल छल। संगहि गरिमा-पलासक बीच गप्प सेहो कम होइत छल। हुनक माय एकरा भाँपि चुकल छलखिन्ह। जहन नहि रहल भेलैन्ह त गरिमा सँ पूछि बैसलिखन्ह, 'तोरा दूनू मे किछु खटपट भेल छौ कि?'नहि त'

'तहन दूनू के बीच एतेक संवादहीनता कियैक? पहिने त तौं हमरा भरि-भरि दिन पलासक बारे मे चर्च करैत छलैंह। मुदा जहिया सँ हम सब इलाहाबाद अयलौं, कोनो चर्च नहि। कि हमर सभक एतय ऐनाय पलास के पसिन्न नहि ?
'नहि... नहि... एहन कोनो गप्प नहि छैक। पलास भरि दिन काज पर झमारल रहैत छथि आ घर मे हमर जहिया सँ मौन खराब भेल, हुनक परेशानी बढि़ गेल छैन्ह ने।

माय, बेटीक गप्प के सुनि चुप्प त भ गेलीह, मुदा हुनक आत्मा एहि गप्प कें स्वीकार नहि कय रहल छल। दोसर दिस गरिमा के मौन सेहो ठीक नहि भ रहल छल। माय-बाप चिंतित होमय लगलाह। मुदा, पलासक लेल धनि सन। अपन दिनचर्या कें अलावे ओकरा जेना किछु आओस सँ सरोकार नहि होइहि...। गरिमाक हालत देखि पिता सेहो दुखी भ रहल छलाह। संगहि गरिमाक माय सँ भेल गप्पक सार बुझलाक बाद हुनक मौन कोनादन होमय लागल रहन्हि। निश्चित केलाह जे आई साँझि मे पलास सँ सोझां-सोझी गप्प करब। कियैक गरिमा कें मौन नहि ठीक भ रहल छै? डॉक्टर कि कहि रहल छै? जदि इलाहाबादक डॉक्टरक बूता मे नहि छै त लखनऊ दूरे कतेक छै? लोक त जरूरति परला पर दिल्ली धरि ल पड़ाईत अछि। कहि पाय-कौड़ीक दिक्कत त नहि... एहने कतेको रास सवाल हुनक दिमाग मे घुमि रहल छल। तखने पलास अयलाह। एकटा बाप के सब्रक बांध जेना टूटि गेल होई। तुरत पूछि बैसलाह, 'गरिमा 'एतेक दिन सँ बीमार ओछाओन पर पड़ल अछि। हिनका त जेना कोनो मतलब नहि होइन्हि। आखिर डॉक्टर कि कहैत छै? कोनो गप्प के दिक्कत अछि त बताऊ, ओकर व्यवस्था कयल जेतै?Ó
एक्केबार एहि तरहक सवाल कें अंदाजा पलास के नहि छल। आई नियत समय सं पहिने घर घुरला पर ससुरक सवालक बौछार अप्रत्याशित छल। ससुर के कि कहतैथ? वियाहक एक्को बरख नहि बीतल आ हमरा दूनूक बीच मनमुटाव भ गेल। गरिमा मनक संताप सँ ओछाओन ध लेलीह। हम नौकरी नहि करैत छी। जदि नौकरी नहि करैत छी त भरि दिन कतय बौआइत छी? एहने बहुतो रास सवाल जन्म ल सकैत छल, जकर उचित जबाव पलास लग नहि छल। से, ससुर के मात्र एतबै कहलाह, ' नहि.. कोनो घबराय वला गप्प नहि छै। गरिमा कें नीक डॉक्टर सँ देखेबाक लेल आई जल्दी अयलौं।

ठीक गदहबेरे मे ... लुकझुक करैत छलैक दिन आ' संध्या ओकरा पछुअओने अबैत छलैक ...। तहने पलास गरिमा के ल क डॉक्टर ओतय बिदा भेलाह। जहिना पलास गरिमा के चलय लेल कहलखिन्ह, बिना कोनो राग-लपेट, उलाहना के गरिमा बिदा भ गेल छलीह। घर मे हुनक माय-बाप। किछुए समय आर बीतल हेतैक ता' रातिक आगमन भऽ गेल रहैक ... अन्हरिया राति रहैक ... घुप्प अन्हरिया ... जाड़क राति ... हार कँपाबऽ वला राति ... आ' सेहो अमावसक ... हाथ-हाथ नहि सुझैत ...। सब अपन-अपन काज मे लागल छल। ... दिन भरि काज मे व्यस्त ... हाट-बाजार ... खेती पथारी ... पौनी पसारी ... नौकरी चाकरी ... मर-मोकदमा ... अस्पताल ओ थानाक चक्कर ... खैरातक खातिर अंचल-प्रखंडक दौड़ आ' कि आस्तिक भक्त-वृंदक मंदिरे-मंदिर भगवत् दर्शन-पूजन आदि ... भिन्न-भिन्न कार्य-व्यवसाय मे लागल ... एमहर-ओमहर जाइत-अबैत ... सर्वत्र चहल-पहल ... वातावरण मे शब्दक टोप-टहंकार जनता-जनार्दन श्रीमुख सँ निकलि चलैत-फिरैत लोको केँ आ' कि जाड़ सँ कठुआइत घर मे दुबकलो केँ ध्यान-भंग करैत ...।

गरिमा आ पलास एखनधरि घर नहि पहुंचलाह। माय-बाप के अंदेशा भ रहल छलैन्ह। घरक बरामदा सँ उतरि सड़क पर बाट जोहैत छलाह। तहने एकटा पड़ोसी हाल-चाल पूछलखिन्ह। मौन अफस्यांत देखि पड़ोसी कहलखिन्ह, 'जुनि चिन्ता करू। संभव जे डॉक्टर ओतय बेस भीड़-भरक्का होइहि। नहि त ट्रैफिक जाम मे सेहो फंसल भ सकैत छथि।' मोन बहलेबाक लेल पड़ोसीक गप्प ठीक छल। कि तखने घरमे फोनक घंटी बाजल।

ट्रिन...ट्रिन...ट्रिन...ट्रिन...
'हेलौ...'
'गरिमा घर पर है क्या?'
'नहीं, डॉक्टर के पास गई है। इम्हर सँ हुनक माय जबाव देलखिन्ह। 'आप कौन?'
'मैं गरिमा की सहेली बोल रही हूँ, उसके साथ ऑफिस में काम करती हूँ।'
गप्प होइते छल कि घरक मेन गेट खुजल आ गरिमा-पलास अयलाह। गरिमा माय सँ फोन थामैत बाजि उठलीह, 'मैं तुम से कल बात करती हूँ। अभी घर में सारे लोग हैं। अच्छा... तुमने माँ से पलास के बारे में कुछ बताया तो नहीं?'
ओम्हर सँ की जबाव देल गेलै, से त माय नहि सुनलखिन्ह, मुदा एतय जरूर बुझलखिन्ह जे गरिमा-पलासक बीच किछु गड़बड़ छै।

(क्रमशः..............)


कहानी’क अगिला भाग लिखबाक लेल टिप्पणी द्वारा सूचित करु. पहिने आऊ पहिने पाऊ सिद्धान्त लागू...

कथा'क      प्रथम भाग ।  दोसर भाग  । तेसर भाग  ।  चारिम आ अंतिम भाग

गरिमा आओर पलास

कथा, भाग-2: लेखक:- राजीव रंजन लाल, मोडेरेटर: केशव कर्ण (समस्तीपूरी)

करण समस्तीपुरी द्वारा लिखल पहिल भाग मे पढ़लौंह, "बचपन से तरुनाई धरि संग चलनिहार गरिमा आ पलासक सतत प्रेम, तमाम वर्चस्व आ विषमताक कात करैत जीवन पथ मे दुन्नु लोकनिक संग आनि देल्कैन्ह. मुदा भावनात्मक द्वन्दक नहि रोकि सकल !" एक पुरुषक अहम् आ नारिक स्वाभिमानक टकराव कोना होएत छैक...., राजीव रंजन लाल जी द्वारा लिखल कथाक एहि भाग मे पढू !!
पलास के गरिमा के प्रति प्रेम अगाध छल आ ओ गरिमा के कष्ट बुझय छलखिन। से ओ जहिया जरूरत होय, गरिमा के मदद करय छलखिन्ह। विवाहोपरांत पलास निश्चय केलैथ जे ओ अपन आलस्य के छोड़ि किछ काज धंधा के अपना के लगौता। गाम में बैस गेला से किछ अकर्मण्यता सेहो आबि गेल छल पलासक जीवन शैली में मुदा ओ कृतसंकल्प भ’ एकटा प्राइवेट नौकरी ज्वॉइन क लेलैथ। ओ एकटा फर्टिलाइजर बनाबय बला फैक्टरी में सुपरवाइजर पोस्ट पर नियुक्त भेलाह। किछ दिन त’ सभ किछ ठीक चलल मुदा एहि काज में दिन राति के ठिकाना नहि छल आ बहुत माथापच्ची बुझेलैन पलास के। हुनका अंदर से लागैत छल जे हुनका भेटल काजक स्तर हुनक योग्यता से बहुत कम छैक। गाम बला बाबूशाही सेहो खतम छल। कोनो मैनेजर आबि के दु बात कहि देय आ पलास के खून के घूंट पीबय पड़य। डेरा पर अयला पर फैक्टरी के तामस कपार पर रहय छलैन्ह। गरिमा सेहो एहि बात के बुझैत रहथिन्ह आ पलास के बहुत हिसाब से शांत राखय के कोशिश करय छलखिन्ह। गरिमा पलास के नीक बेजाय के ख्याल राखय के कोशिश करय छलैथ आ एहि से पलास के धधकैत दिमाग के किछ शांति भेटैन्ह। क्रमश: पलास पर ऑफिस के बात बेसी हावी होयत गेलय आ गरिमा के समझाबै के असर क्षीण। आब पलास के लागैत छल जे गरिमा के हुनक स्वाभिमान के कोनो चिंता नहि छैन्ह। पलास के गरिमाक तुलना में आधो से कम तनख्वाह भेटैत छल। हुनक दिमाग पता नहि कोना, एहि बात के तुलना करय लागल। पलास के इहो लागय लागल जे शायद गरिमा हुनका एहि कारणे कम योग्य बुझैत छथिन्ह आ एहेन तुच्छ नौकरी के तरफदारी करैत छथिन्ह। मानव मन के बुझनाय बहुत कठिन होयत अछि आ ओ कखन कोन बात पर विचलि जेतै सेहो अनुमान लगेनाय कठिन।

सात–आठ दिन पहिने कोनो बात पर पलास मैनेजर से मुँहा-मुँही भ’ गेल आ ओ नौकरी के लात मारि आबि गेलखिन्ह। दुपहरिये में घर पहुँच गेलैथ। दिमाग में दस तरह के बात घुरिया रहल छल। कखनो अफसोस होय जे बेकारे नौकरी छोड़ि देलिये आ कखनो हुनकर मोन कहय जे भ’ गेलै सैह उचित छल। घर अचानक से खाली लागय लागल। हुनका कहियो एतैक खालीपन महसूस नहि भेल छल। गरिमा साँझ में ऑफिस सँ आबैत रहथिन्ह। पलास के अचानक महसूस भेल खालीपन में गरिमा के कमी खलल। पलास के वैचारिक मतभेद हुनका गरिमा से बहुत दूर क देने छल। गरिमा के सेहो एहि बात के अनुमान लागि गेल छल आ एम्हर किछ दिन से ओ पलास के नौकरीक विषय में किछ नहि पूछय छलखिन्ह। पलास के मन में कतओ दुविधा आ अंतर्द्वंद चलि रहल छल। गरिमा नीक आ कि पलास नीक। पलास के लेल दुनु दु विचारधारा के प्रतीक छल आ कतओ से हुनक मोन बारंबार हुनका से कहि रहल छल कि गरिमा के विचार हुनक अपन विचार से नीक छल। किछ देर आउर बीतला पर ई विचार एतैक हावी भ’ गेल पलास के दिमाग में जे ओ प्राय: स्वीकार क’ लेने छलैथ जे एहि प्रकरण में ओ गलत छैथ। दिमाग किछ शांत भेल आ ओ गरिमा के इंतजार करय लागलाह।

सांझ भेला पर गरिमा अपन समय से आबि गेलखिन्ह। घर में पहिने से पलास के देखि हुनका मोन में शंका भेलनि मुदा मुसका के पुछलखिन “कि बात, आय पहिने आबि गेलियै”।
“अहाँ के बेजाय लागल कि, हमर घर पहिने एनाय?” पता नहि पलास कोना अचानक से उखड़ि के जवाब देलखिन।

“नहि-नहि, से किया कहैत छी? ओनाही पुछलौं, जे मोन ठीक अछि कि नहि।” गरिमा के जवाब छल। ”आय मैनेजर से बाता-बाती भ’ गेल छलै। नौकरी छोड़ि के आबि गेलियअ। पता नहि अपना के कि बुझय जायत छैक। जेना लागय छै ओकर बाप के कर्जा धारणे छियै।” पलास अपन बात गरिमा से कहलखिन। हुनका मोन में छलैन जे गरिमा हुनक विचार के ऊपर राखैत हुनक समर्थन में बाजथिन। मुदा गरिमा के जवाब छल “आय काल्हि कतेक मुश्किल से नौकरी भेटय छै आ सौंसे ई परेशानी त’ रहबे करैत छै। अहाँ के नौकरी नहि छोड़बा के चाही छल।”
एतबा सुनैत पलास के स्वाभिमान जागि उठल आ ओ गरिमा के कठुआयल बात कहय लागलखिन्ह। कहैत काल हुनका विचार नहि रहि गेलैन जे गरिमा हुनका सँ वियाह करय ल’ तखन तैयार भेल रहथिन्ह जखन पलास गाम में बैसल रहैथ। गरिमा के माँ-बाबूजी के कनेक आपत्ति सेहो छल, मुदा गरिमा के खुशी के कारणे एहि प्रस्ताव के स्वीकार केने छलखिन। “अहाँ के ई चिंता नहि अछि जे हमरा के गारि बात कहैत अछि, मुदा अहाँ के एहि बात के बड्ड अफसोस अछि जे घर में पैसा एनाय कम भ’ जेतय। बाहर त’ मजदूर जकाँ पेड़ैबे करय छी, अहुँ के लेल हम एकटा पैसा छापय बला मशीन भ’ गेल छी। अहाँ के की भेटय यै आ की नै भेटय यै से हम कहियो हिसाब किताब नहि करय गेलौं। आय अहाँ कमबै छी त’ हमरा गुलाम नहि बुझु आ कनेक हिसाबे से बाजू, नहि त’ ठीक नहि होयत।”

गरिमा स्तब्ध छलीह। एहेन प्रत्युत्तर के परिकल्पना गरिमा के नहि छल। हुनको स्वाभिमान जागि गेल छल आ सब किछ बुझैतो ओ अपना के काबू में नहि राखि सकलखिन आ ठोकले जवाब देलखिन। “हमहीं छलहुँ जे माँ-बाबूजी के नहियो पसंद भेला पर अहाँ संग वियाह केलौं। तखन अहाँ कोन कमबै छलियै आ हमरा कोन पैसा के मोह छल। ना हम अहाँ के नौकरी करय ल’ कहलौं ना छोड़य ल’। हम किया अहाँ के पैसा छापय के मशीन बुझब। हमरा कोन खगती अछि पैसा के। अहीं झखै छी पैसा के लेल आ नौकरी के लेल। आब हमरा बुझा रहल अछि जे अहाँ के हमरा से नहि, हमर नौकरी से प्यार अछि। अहाँ के नौकरी नहि, लाटसाहबी चाही, से त’ कतओ भेटय बला नहि अछि। कनिये के पाय पर गुलछर्रा उड़ाबय चाहैत छी त उड़ाउ। हम त कहियो नहि रोकलौं अहाँ के।”
“हम कि शराब, सिगरेट में पैसा फेकैत छी। अखन एको दिन नौकरी छोड़ला नहि भेल हमर आ अहाँ अपन पैसा दिखा रहल छी। हम अहाँ के भरोसे जिनगी नहि काटि रहल छी। एहेन एहेन बहुत पाय बला देखने छी हम। पाय कमाबै छी त’ अहाँ नाँगड़ि बला नहि भ गेलौं से नाचि रहल छी।” पलास के बाजय में सम्हार नहि छल।
बात बिगड़ैत गेल आ गरिमा कानय लागलखिन्ह। पलास के अचानक बोध भेलनि जे ओ बहुत किछ अनर्गल कहि देलखिन्ह जेकर जरूरत नहि छलय। ओ चाहैत रहथिन्ह जे गरिमा के जा के सम्हार लैथ मुदा स्वाभिमानवश ओ उठि नहि सकलाह। फूसि अहंकार के अधीन भ’ गेल छलैथ पलास। अचानक सँ युगल जोड़ी के केकरो नजरि लागि गेल छलय। एक छत के नीचा रहितो अनजान भ’ गेलैथ गरिमा आ पलास।

गरिमा के हृदय के आघात पहुँचल छल आ ओ अंदरे-अंदर घुलय लागलखिन। शरीर क्षीण होयत गेलैन आ ओ अखन बीमार छलीह। पलास के लेल ई विकट अवस्था आबि गेल। ओ कि करौथ। अपन प्यार के देखौथ की स्वाभिमान के। ताहि पर आय सांझ में गरिमा के माँ-बाबूजी शादी के बाद पहिल बेर इलाहाबाद आबि रहल छथिन्ह। हुनका सभ के किछियो भनक नहि छैन्ह एहि सप्ताह बीतल बात सभक। गरिमा सेहो नहि चाहय छलखिन्ह जे अखन हुनक माँ-बाबूजी इलाहाबाद आबैथ। ओ हुनका सभ के दुखी नहि देखय चाहैत रहथिन। एक-दु बेर त’ मना केलखिन, लेकिन गरिमा के माँ नहि मानलखिन जे पाहुन सेहो ऑफिस चलि जायत छथिन्ह त’ तोहर सेवा-सुश्रुषा के करतौ। पलास केना ई सभ के मैनैज करथिन्ह से कठिन प्रश्न छल हुनका लेल।
(क्रमशः..............)

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गरिमा आओर पलास

कथा, भाग-१: लेखक एवम मोडेरेटर: केशव कर्ण (समस्तीपूरी)
गरिमा एखन ऑफिस सँ अएले छलीह. चाह’क केतली गैस पर चढा क' वर्षा मे भीजल केश के सुखाबए लागलीह. फेर चाह आ रेडियो ल'क' बालकनी मे आबि गेली. आल इंडिया रेडियो पर 'बरखा बहार आयी रस की फुहार आयी' बाजि रहल छल. सामने फिल्ड मे पलासक फूलक उज्जर धप-धप चद्दर बिछल छल. गरिमा सोचए लागलीह, हुनको पलास त' हुनक हर ख़ुशी ले अहिना आंखि बिछेने रहैत छल. एक बेर गरिमा कहने छली जे हुनका आमक अंचार बड़ पसंद छैन्ह आ पलास अगले क्षण ताख पर राखल शीशा वाला बोइयामक एक हिस्स एक्के बेर मे पार क' देने रहथि. भन्ने एहि फेर मे बोइयाम खसि क' टूटल, हुनक हाथ कटल आ माताजी के डांट सेहो सुनाए पड़ल. गरिमा’क कैमरा वाला मोबाइल फ़ोनक बड़ शौक छलैन्ह. सांझे मे हुनका एक गोट सरप्राइज गिफ्ट भेंट गेलन्हि. डिब्बाक भीतर एक सोनी एरिक्सन मोबाइल फ़ोन’क अलावे एक गोट पुर्जी जहि पर पिंक स्केच पेन से लिखल छल "इट्स माय प्लीजर" - पलास! फेर त' विद्यार्थी जीवन मे मासक बाँचल दिन कोना गेल से त' पलासे के मोन छैन्ह कि हुनका सँ एक बेर "आज कल तुम शेव क्यूँ नहि करते ?" पुछए वाली गरिमा कें.
एहि कहानी’क पहिल भाग सँ मैथिली साहित्य’क इतिहास मे एक अध्याय आओर जुड़ि गेल. एहि सँ पहिने कहियो एहेन नहि भेल छल जे एक कथा केँ कएक लेखक मिलि जुलि केँ लिखने हो. प्रत्येक लेखक केर अलग भावना. कथा’क पहिल भाग लिखताह किओ एक लेखक, दोसर भाग मे उठा पटक करताह केओ दोसर लोक, उत्कर्ष पर चढेताह किओ तेसर आ नहि जानि अन्तिम लोक अपन सोच सँ कहानी केँ बिल्कूल अलगे अन्त दऽ दैथि. सब मिला केँ प्रत्येक लेखक के अपन भावना’क हिसाब सँ कहानी मोड़ लेत आ पाठक केँ एक रुचिगर कथा पढ़बाक लेल भेटतन्हि.हमरा बुझने आन दोसरो वेबसाइट पर एहेन प्रयोग’क सुरुआत काएल जायत मुदा केशव जी’क लिखक एहि कथा-क मैथिल साहित्य’क इतिहास मे सम्मान’क सँग विद्यमान रहत.

आदि यायावर



पलास आ गरिमा बचपने सँ संगी छलथि. स्कूल, कॉलेज, प्रतियोगिता परीक्षाक तैय्यारी आ फेर इंटरव्यू. बचपन से तरुनाई धरि जिनगीक सफ़र मे हर कदम पर पलास गरिमा के साथे छलथि. मुदा एतहि से दुन्नु लोकनिक रास्ता अलग भ' गेल्लैन्ह! गरिमा सफल भए सी. पी. डबल्यू. डी. मे नौकरी करए ईलाहाबाद चलि गेलीह आ पलास असफल भए अप्पन गाम ! किछु दिन धरि त' फ़ोन, एस.एम.एस. मेल आ चैट के दौर सकुशल चलैत रहल. मुदा ई दूरी दुन्नु लोकनिक आओर करीब आनि देल्कैन्ह. साल बितैत-बितैत पारिवारिक सहमति सँ दुन्नु लोकनि परिणय सूत्र मे बंधि गेलथि. पलास अल्लाहाबाद आबि गेलथि. गरिमाक जिनगी कें त' मानु जे खुशी के पाँखि लागि गेल होए. मुदा फेर शुरू भ' गेल टकराव, एक पुरुषक अहम् आ एक नारीक स्वाभिमान’क !

 

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एना कते दिन (कथा) - सतीश चन्द्र झा

- श्री सतीश चन्द्र झा

स्वच्छ आ निर्मल आँखिमे जेना नोर झिलमिलाए लगैत छैक अथवा ओसक बुन्न फूल पर चमकऽ लगैत छै, तहिना ओकर ठोरो पर मुस्की नुका नञि सकैत छलैक। कखनहु कोनो बात हो कोनो प्रसंग हो ओकर मुस्की सुहागिनक लाल-लाल सिन्दुर सँभरल सोउँथ जकाँ हरदम चमकैत रहैत छलैक। सैकड़ो युवतीक छटाक तुलना मे ओकर आकर्षक व्यक्तित्वक मुस्कीक कोनहु विकल्प नहि छलैक। किओ देखै वा नञि, हमर आँखि ई सुखक लेल सदैव उत्सुक रहैत छल।कक्षामे ओ हमरे पाँजरवला बेन्च पर बेसैत छल, दिनमे कइएक बेर ओकर आ हमर आमना-सामना होइत छल, जखन देखु प्रसन्न जखन गप्प करु वैह चंचलता सँ परिपूर्ण, अपन छटा केँ आवश्यकतासँ बेसी आकर्षक बनेबामे प्रयत्नरत, अनुभा हमरा लेल प्ररेणा छल। ओकर मुस्की हमरा एतेक प्रभावित केने छल जे हम एक दिन पुछिए देने छलियैक-

Satish Chandra Jhaलेखक- श्री सतीश चन्द्र झा,
म.न. 119, क्रॉस रोड, संत नगर
बुराड़ी, दिल्ली- 110084
सम्पर्क- 9810231588


अनुभा! एतेक मनमोहक मुस्की अहाँकेँ कतऽ सँ भेटल?
ओ हमरा दिस ताकि गंभीर भऽ गेल छल आ पुन: एकटा वैह आकर्षक छटावला मुस्की दऽ देने छल, बुझु जे ओ हमर उतर दऽ देने छल।

मुदा ओहिसँ हमरा संतोष कतऽ? हम तऽ ओकर चान एहन मुखमंडल सँ सुनऽ चाहैत छलहुँ। हमर बड़ जिद्द पर ओ कनेकालक वास्ते गुम्म भऽ गेल फेर कहलक-ई तऽ हमर स्वभाविक गुण अछि, ई नैसर्गिक अछि, कोना कहु जे कतऽ सँ भेटल।
बातो सत्ये छलैक, किञो कोना कहि सकैत अछि जे हँसब बाजब, कानव कखन ककरा कतऽ सँ भेटलै, हमहु केहन बातऽ करऽ लागल छलहुँ।
हमरा ओहिना स्मरण अछि जे परीक्षाक व्यस्त दिन छल, ओहि समय कखन साँझ होइत छल, कखन खेबाक बेर होइत छल, किछु पतो नहि रहैत छल, किताबक पन्ना आँखिमे, नचैत रहैत छल, नील रोसन इ सँ लिखल 'नोटक' वाक्य ओहिना दिमाग पर आच्छादित रहैत छल, एहने व्यस्तता सँ भरल दिनमे एक दिन एकाएक भेट भेल छल अनुभा सँ, कने ध्यान दऽ देखताहुँ तऽ उदास भऽ गेल छलहुँ-जगरना सन आँखि, ठोर पर पपड़ी जमल आ ओ मनमोहक मुस्की नहि जानि कतऽ हरा गेल छलैक, पूरा हालत अस्त-व्यस्त। ओकर एहन हालत देखि नहि जानि मनमे केहन-केहन बात आबि रहल छल, छातीक धड़कन अपन दैनिक गतिसँ तेज भऽ गेल छल-हम घवड़ायले भावे पुछलियैक-कि भेल अनुभा?
ओ चुप्प छल।
ओकरा चुप्प देखि हमरा रहल नहि भेल, ओकर दुनु कान्ह के डोलबैत पुछलियै-आखिर बात की अछि अनुभा? किएक ने बजैत छी? कहुने जे कि भेल?

ओ मुस्कीक व्यर्थ प्रयास करैत कहलक-संजू! हमर परीक्षा खराब भऽ गेल अछि, हम ठीक सँ लिखि नहि सकलहुँ अछि, एहि वर्ष पासो होयब असंभव बुझाइत अछि, आ ओकर आँखि सँ नोर खदसि पड़ल छलैक।
सान्त्वना दैत हम कहलियै-केहन बात करैत छी अनुभा, ई कोनो एहन बात तऽ नहि जाहि लेल अपन जीवने बदलि देल जाए, आदमी अपन स्वभाविक स्वभाव बिसरि खंडहर बनि जाए। अहाँ बताहि तऽ नहि भऽ गेलहुँ अछि अनुभा? देखु तऽ अपन हालत कि सँ की भऽ गेलहुँ अछि। देखु अनुभा, मेहनति करब हमर कर्तव्य थीक, सफलता, असफलता ई तऽ हमर हाथमे नहि अछि, तखन एतेक चिन्तित हैब व्यर्थ थीक। ई तऽ सर्वविदित छैकने, जे महाभारतक युद्ध मे श्री कृष्ण जनैत छलथिन्ह जे अभिमन्यु जे युवावस्थाकेँ प्राप्ते केने छल, चक्रव्यूहमे मारल जायत, यद्यपि ओ बचा सकैत छलथिन्ह तथापि ई कहि जे होबाक छैक से भइए कऽ रहैत छैक आ अभिमन्यु अपन कर्तव्यकेँ खूब नीक जकाँ निमाहलक। हुनक आँगा तऽ हम अहाँ...।
अनुभा बाजल-नहि संजू! अहाँ नहि जनैत छी, एहि वर्ष पास होयब हमरा लेल बड़ आवश्यक अछि, बेर-बेर असफलता सँ हमर स्थिति केहन भऽ गेल अछि से अहाँ जनैत छी?
हम उदास भऽ कहलियै-कि करबै अनुभा, जे होबाक रहैत छैक से तऽ भइएकऽ रहैत छैक।
प्रयास करितो ओ मनमोहक मुस्की अनुभाक मुख पर नहि आबि सकल छलै आ ओ विदा भऽ गेल छली।
किछुक दिन बाद ओ आयल छली, वैह हालति, ओहिना खिन्न, वैह उदासीक रुप।
हम पुछलियै-अहाँक भूत एखनधरि नहि उतरल अछि कि?
ओ मन्हुआयले मोन सँ कहलक-उतरि जायत। जे होबाक छल से तऽ भऽ गेल, आब कथिक लेल कानब आ कथीक भूत। ई किताब अनालहुँ अछि से लऽ लिअ।
हम आश्चर्य भऽ पुछलियैक-की अहाँ आगू नहि पढ़व? पढ़ाई-लिखाइ तऽ भागयक खेल अछि-किछु दिनक बाद हमर विवाह भऽ रहल अछि फेर केहन पढ़ब लिखब ओकर उत्तर छल। मुदा?
मुदा कि संजू? जँ किछ, कहबाक हो तऽ कहि दिअ, नञि जानि फेर भेट हैत कि नहि। हम तऽ अपन मनक गप्प कहबा लेल छलहुँ कि बीचहि मे...जै अहाँके किछु कहबाक हो तऽ कहि दिअ....लेकिन हमहु किछु कहि नहि सकल छलियैक।

हमरा लागल जेना ओ विवश छली आ विदा भऽ गेल छली मुदा एक तुफान सन बिहाडि़ छोडि़ गेल छली जाहिसँ हमर अन्त: करण आन्दोलित भऽ गेल छल, जे आइयो शांत नहि भऽ सकल छल आ कतेको प्रश्र हमर मनमे अउनाइत रहल हम किछु कऽ नहि सकलहुँ।
आब हमहुँ बैकक नौकरी करऽ लागल छलहुँ, एहि वर्ष गृहस्थी जीवन मे प्रवेश केने छलहुँ। आफिस जयबाकाल पत्नी कहने रहथि-हे सुनै छी, आइ कने जल्दी चलिआयब आइ साँझमे अस्पताल जयबाक अछि। से किएक? कि अपस्तालक....

धूर जाऊ-अहाँके तऽ हरदम हँसीए मजाक बुझाइत अछि, हमर गामक जे फुचाइ बाबू छथिन ने, तिनके बेटी अनुभा अस्पतालमे भर्ती छैक, कने जिज्ञासा कऽ लेनाइ जरूरी ने छैक-हँ...हँ अवश्य, यैह सब तऽ समाज में, परिवारमे नाम रहि जाइत छैक, मुदा अनुभाक नाम सुनितहि हमर मन डरा गेल छल, मनमे एक अजीब सन भयक संचार होमऽ लागल छल, मुदा मन के सम्हारैत ऑफिस विदा भऽ गेलहुँ।

साँझ मे अस्पतालक वास्ते विदा भेलहुँ, मुदा रिक्सा पर मन घ बड़ा रहल छल आ रहि-रहि कऽ एक्के बातक डर भऽ रहल छल जे बैह अनुभा तऽ नहि अछि। एहि बात सँ भरि देहमे पसेनाक बुन्न छोडि़ देने छल, जेबी सँ रूमाल बहार कऽ हम पोछ लागल छलहुँ। जाड़ोमे पसेना छुटि गेल, कि अस्पतालक डर होइत अछि? नहि...नहि एहन बात नहि छैक, ऑफिस सँ अएलाक बाद तुरन्ते विदा भऽ गेलहुँ अछि ताहि कारण मन कने थाकल बुझाइत अछि-हम पत्नीक बातकेँ अनठियबैत कहने रहियैन्ह।

अस्पताल पहुंचलहु तऽ ओहिठाम हड़बिरड़ो उठल छल, डाक्टर, नर्स आ कम्पाउण्डर सब किञो इम्हर सँ ओम्हर दौड़-बरहा कऽ रहल छल। ऑपरेशन घरक एक कोनमे बैसल शोक संतप्त परिवार दिस हमर पत्नी चलि गलीह आ गप्प केलाक बाद ओहो उदास भऽ गेल छलीह, एहि सबटा घटनाक हम मूक दर्शक बनल रहलहुँ जेना एही वास्ते आयल रहि।

ओहिठाम कातमे बैसल एकटा अति शोक संतप्त युवक दिस हम बढि़ गेल छलहुँ, हुनकहि सँ ज्ञात भेल जे हुनकहि पत्नीक आपरेशन भऽ रहल छनि, संगहि इहो कहलनि जे जहिया सँ हुनक विवाह भेलनि अछि तहिया सँ पत्नी अस्वस्थे रहैत छथिन आ ताहिमे दोसर बेर माँ बनि रहल छथि। डाक्टर लोकनिक कहब छनि जे बच्चा तऽ बाँचि जायत मुदा...

नहि...नहि...एहन बात नहि बाजू सभक रक्षा भगवान करैत छथिन, ऐना जँ अहिँ करब तऽ फेर....
एहि बीच कन्नारोहट उठि गेल छलै, ओहो युवक आम्हरे दौड़ गेल छलाह मुदा पत्नी सदाक लेल संग छोडि़ गेल छलथिन। हमरो आँखि सँ नोर टघरऽ लागल छल आ धीरे-धीरे हमहु ओम्हरे डेरा बढ़ा देने छलियैक।

अनुभा...! एकाएक ओकर शव देखि हमर बढ़ल डेग रूकि गेल छल। हमरा जकर अनुमान भेल छल ओ साक्षात सामने छल, वैह अनुभा जे कहियो हमर प्रेरणा छल। हम तऽ कल्पना मे नहि सोचने रहि जे अनुभा सँ फेर भेट हैत मुदा बिडम्बना देखु जे भेट भेवो कयल तऽ लाशक रुप मे। ओकरा संग बीतल युवावस्थाक दिन हमिरा ओहिना स्मरण आबऽ लागल छल, देह थरथराए लागल छल, कहुनाकऽ अपनाकेँ सम्हारैत कहुना कऽ डेग आगू बढ़ेने छलहुँ। डाक्टर लोकनि सँ ज्ञात भेल जे एकर मुख्य कारण जल्दीए दोसर बेर माँ बनब अछि कारण एक बच्चाक बाद शारीरिक रुपँ ओ ततेक ने कमजोर भऽ गेल रहथि जे दोसर बेरक हेतु ओ एखन तीन-चारि वर्ष धरि माँ नहि बनि सकैत छलीह, मुदा से नहि भऽ सकल छलनि...। बादमे हमरा दुखो भऽ रहल छल जे ओहि युवक केँ हम बहुत बातो कहि देने रहियैन जे पढि़-लिखि गेलाक बादो अहाँलोकनि भावुकताक प्रवाह मे ऐना ने बहि जाइत छी जे भविष्यक कोनो चिन्ते नहि। जँ आइ उचित परिवार नियोजनक कार्य प्रणाली पालन केने रहितहु तऽ आइ एहन परिस्थिति नहि अबैत, हमर बात पर ओ कानऽ लागल छलाह आ हमरो आँखि सँ नोर खसि पड़ल छल।

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लेखक: आदि यायावर मूलनाम: डा. कुमार पद्मनाभ पीयूस आफिस पहुँचि गेल छलाह. सबसँ पहिने अपन लैपटॉप खोलि फेसबुक में स्टेटस अपडेट केलाह आ ...