जिनगी कोना भेंटत ?
नव बरखक बहाने- कुन्दन कुमार मल्लिक
अनचोँकहि मे नीन टूटल
बाहर पट्टखाक शोर छल
करैत लोक अनघोल छल
तखन बुझना मे आयल
इ त’ स्वागत करैत
नव बरखक बोल छल
केओ नव वसन मे चमकैत
केओ मदिरा सँ बहकैत
त’ केओ सुन्दरी संग नाचैत
ओहि मोहल्ला मे एकटा घर एहनो छल
जतहि ने कोनो शोर छल
नहि कोनो अनघोल छ्ल
आइयो ओकर चूल्हि छल मिझायल
पेट जेना पीठ मे धँसल
छलहुँ हम अपना सँ पुछि रहल
की ओकरा लेल नव बरखक कोनो मोल छल?
गोली-बन्दूक थोडे बुझैत छैक
दू गोट मलयालम कविता
बाट पर खसल मोरक ओस पर
हम लिखि रहल छी, तोहर नाम
मूल कवि- श्री के. सच्चिदानन्दन,
मैथिली अनुवाद- श्री सुभाष चन्द्र
जेना, पहिनहुँ कोनो कवि
लिखने छल नाम- स्वतंत्रता केँ
हरेक वस्तु पर।
तोहर नाम लिखय लागी त'
मिटेनाय कठिन भ' जेतय
धरती आ आकाश पर
क्रान्तिक संग
प्रेमक लेल सेहो स्थान छै
मलयालम कें प्रख्यात कवि के.सच्चिदानंदनक कविता कें पंजाबी में अनुवाद डा. बनीता कएलीह,जे ‘‘पीले पत्ता का सपना’’शीर्षक सँ पुस्तक रूप में साहित्य आकादमी, दिल्ली द्वारा वर्ष 2003 में प्रकाशित भेल। ई कविता एहि पंजाबी कविता संग्रह सँ लेल गेल अछि, जकर पंजाबी सँ हिन्दी अनुवाद "सुभाष नीरव" कएलाह। मैथिली में कविताक अनुवाद हिन्दी सँ कएल गेल। श्री. सच्चिदानंदन साहित्य अकादमी कें सचिव रहि चुकल छथि आ हिनक बहुत रास कविताक अनुवाद भारत आ विश्वक कतेको भाषा में भ' चुकल अछि।
तोहर नामक सजौट पर
सूति रहल ही हम
तोहर नामक चहचहाटक संग
जागैत छी हम
जतय-जतय हम स्पर्श करैत छी-
उभरैत अछि तोहर नाम
झटैत पात कें घसमैल रंग पर
पुरान गुफाक स्याह दीवार पर
कसाईक दोकान कें केवाड़ पर
भीजल रंग पर
नबका स् पर
चांदनी के फड़फाइत पाँखि पर
कॉफी आ नून पर
घोड़ाक नाल पर
नर्तकी केँ मुद्रा पर
मधु औ विष पर
नींद पर, रेत पर, जड़ि पर
फाँसीक तखत पर
मुर्दाघर के सर्द जमीन पर
“मसान-शिला के चिक्कैन पीढ पर।
2. हमरा कि बूझ
हम दूनू बच्चा छीं
जे माय-बापक खेल बेल रहल छी-
जानैत नहि छी- आलिंगनक अर्थ
हमरा कि बूझल चुम्माक विद्युतमयी प्रवाह
बस, एहिना स्पर्श कय लैत छी
किछु पात...
किछु फूल...
किछु फल...
बड्ड ममतांक संग निहारैत अछि प्रकृति हमरा
जिनगी में ठसाठस मरल
वं”ा- तृ’णा कें
मद्धिम लौ कें
अमर होबाक एहि
अर्थहीन इच्छा में
सुनू....
राति आँगन में दौडै़त चलि जा रहल अछि।
बाढि पर एक कवि- डॉ. गंगेश गुंजन
ताकैत आसरा कोनो दुःख पी रहल- ए लोक !
घर-द्वारि दहि गेलैक सब बच्चा टा छै बांचल
रेलवेक कात, बाट-घाट जी रहल- ए लोक !
सांझो भरिक खोराक ने छैक अगिला फसलि धरि
जीबा लए ई लाचार कोना जी रहल- ए लोक !
कवि- डॉ. गंगेश गुंजन,
74- डी, कंचनजंघा अपार्टमेंट,
सेक्टर- 53, नोएडा- 201 301
सबटा गमा क' जान बचा आबि त' गेलय
आब फेकल छुतहर जेकाँ हद जी रहल- ए लोक !
जले पहिरना, बिछाओन जले छैक ओढना
जबकल गन्हाइत पानि-ए खा पी रहल - ए लोक !
सब बर्ष जकां एहि बाढि मे कारप्रदार
रिलीफ नामें अपन झोरी सी रहल किछु लोक !
चलि तँ पडल- ए जीप- ट्रक - नावक से तामझाम
आब ताही आसरा मे बस जी रहल- ए लोक !
कहि तं गेलाह- ए परसू- ए दस टन बंटत अन्न
एखबार- रेडियो भरोसी जी रहल- ए लोक !
घोखै तँ छथि देश मे पर्याप्त अछि अनाज
सडओ गोदाम मे, उपास जी रहल- ए लोक !
उमेद मे जे आब आओत एन जी ओ कतोक
द' जायत बासी रोटी, वस्त्र, जी रहल- ए लोक !
अछि कठिन केहन समय ई राक्षस जकाँ अन्हार
किछु भ' रहल अछि तय , तेँ त' जी रहल- ए लोक !
दर्पण- श्री सतीश चन्द्र झा
देखि लेब किछु क्षणिक ठहरि क'।
करब कर्म जे अपन दिन भरि
आयत मुख पर भाव उतरि क' ।
बनतै नहि प्रतिबिम्ब झूठ के
उचित कर्म सँ छिटकत आभा।
कवि- श्री सतीश चन्द्र झा, व्याख्याता, दर्शन शास्त्र, मिथिला जनता इंटर कॉलेज, मधुबनी
अनुचित करब मोन किछु टोकत
विकृत बनत मुँहक शोभा ।
जहिया बैसब असगर कहियो
करब जीवनक लेखा-जोखा।
झहरत बूँद आँखि सँ ढप-ढप
रंगहीन लागत जग धोखा ।
छै बताह इ अहं मोन के
जौं जागत नहि सूतत कहियो।
बाँधि लिअ सामर्थ्य हुअए त'
भरि मुठ्ठी बालू के कहियो।
करब अपार अर्थ धन संचय
संस्कार नहि उपजत धन सँ ।
बिलहि देत संतानक भविष्य
दुख-सुख सबटा भोगब तन सँ।
चलू ताकि क' आबू कखनो
अछि धरती जे पैरक नीचाँ।
देखियौ सुन्दर कतेक लागै छै
ओस दूभि पर जेना गलैचाँ ।
आसमान अछि दूर एतय सँ
नहि देखू अछि मात्र कल्पना ।
लागत चोट पैर मे कहियो
जीबू जे अछि ल' क' अपना।
दुविधा- श्री संतोष कुमार मिश्र
अपनापर बिचारै छलहुँ
अप्पन भावना के हेराक'
अनुभव के डुबाक'
हम बड सोचलहुँ
कवि- श्री संतोष कुमार मिश्र। जनकपुर (नेपाल) निवासी श्री संतोष कुमार मिश्र जी काठमाण्डू (नेपाल) मे एकटा बहुराष्ट्रीय कम्पनी मे अधिकारी छथि। मैथिली साहित्य सँ विशेष लगाव आ मैथिली मे एखन धरि “पोसपूत" आ "उदास मोन” (कथा संग्रह), एना (आईना) (सम्पादित कविता संग्रह) प्रकाशित आ एखन एकटा कविता संग्रह "एना किए" प्रकाशनाधीन छन्हि। सम्पर्क- 00977-98510-11940 (मोबाइल)
जे हमरा मे तीव्रता के कमी अछि
हमरा निश्चय भ' गेल
जे हम बड सोचलहुँ
जे हम अहाँक प्रेमक लागक नहि छी
मुदा ई भइयो नहि सकैए की
अहाँके पहिल बेर देखिक'
हमरा मोन मे व्याकुलता आएल
जाहिके हम वर्णन नहि क' सकैत छी
दोसर बेर भेट होइते
हम अहाँ सँ परिचित भेलहुँ
ताहिके बाद अहाँ लग रहबाक
इच्छा हमरा मे जागल
अहाँक संग जे हमर
भावनात्मक सम्बन्ध रहय
से बड उपद्रवी रहय
ते हम बीतल भरि राति
भगवान सँ प्रार्थना करैत
हम बड सोचलहुँ
जाहि सँ हम सभ्य भ' गेलहुँ
ई बात हमरा बुझ' मे चलि आयल छल
जे हम नियंत्रण मे नहि छी
आ अपन नियंत्रण गुमा रहल छी
हम समय के पकड' चाहलहुँ
मुदा हमर भावना समय के छोडि देलक
पहिने हम प्रेम मे परलहुँ
आ बाद मे बुझलहुँ
ई एक सामाजिक अपराध छैक ।
अंतिम फेसबुक अपडेट
लेखक: आदि यायावर मूलनाम: डा. कुमार पद्मनाभ पीयूस आफिस पहुँचि गेल छलाह. सबसँ पहिने अपन लैपटॉप खोलि फेसबुक में स्टेटस अपडेट केलाह आ ...