जिनगी कोना भेंटत ?

दुख:क ठोर पर हंसी कोना भेंटत ?
जेकरा भाग्ये में अछि दुःख,
ओकरा ख़ुशी कोना भेंटत ??
जे नहि बेचलक अप्पन आत्मा कें,
ओकरा नौकरी कोना भेंटत ??
गामो कए रहल अछि शहरक देकसी,
आब कतहु सादगी कोना भेंटत ?
चान पर बढि रहल अछि प्रदुषण,
भला कहू ! चांदनी कोना भेंटत ??
ओना त' मोन सबहक होएत छैक,
मुदा सबहक "परी" कोना भेंटत ?
हाट पसरल अछि मौअतिक सभ तर ,
एहि में जिनगी कोना भेंटत ??
दुख:क ठोर पर हंसी कोना भेंटत ??

- करण समस्तीपुरी

नव बरखक बहाने- कुन्दन कुमार मल्लिक

इ की भेल,
अनचोँकहि मे नीन टूटल
बाहर पट्टखाक शोर छल
करैत लोक अनघोल छल
तखन बुझना मे आयल
इ त’ स्वागत करैत
नव बरखक बोल छल
केओ नव वसन मे चमकैत
केओ मदिरा सँ बहकैत
त’ केओ सुन्दरी संग नाचैत
ओहि मोहल्ला मे एकटा घर एहनो छल
जतहि ने कोनो शोर छल
नहि कोनो अनघोल छ्ल
आइयो ओकर चूल्हि छल मिझायल
पेट जेना पीठ मे धँसल
छलहुँ हम अपना सँ पुछि रहल
की ओकरा लेल नव बरखक कोनो मोल छल?

-कुन्दन कुमार मल्लिक, बेंगलुरु (कर्नाटक), सम्पर्क- +91-97390 04970

गोली-बन्दूक थोडे बुझैत छैक

- करण समस्तीपुरी

"छौंरी पतरकी गे........ गोरिया खेतबा के आरी.... काहे मारे गजब पिहकारी.... !!" गोर दक-दक भरल-पुरल शरीर, माथ पर जटा, हाथ मे डिबिया लेने आ तोतर आवाज मे इएह गीत के तान छोडैत घर से बथान पर जाएत जटा झा के प्रति पता नहि कोना हमरा मोन मे लगाव उत्पन्न भए गेल. जटा झा के वयस हमरा से इएह कोनो सात-आठ साल बेसी रहल होयतन्हि आ हुनक घर से बथानक बाट मे हम्मर घर एखनहु अवस्थित अछि. ओना त’ जटा झा के ई विशेषता छैन्ह जे ओ कखनो अप्पन मुंह बंद कए नहि चलैत छथि. भन्ने आवाज मे तोतर लागौक मुदा गीत के तान नहि मद्धिम होअ' देता. नित्य सांझ के दूर से आबैत जटा झा के छौंरी पतरकी.... के अलाप सुनैते हम अप्पन दलान पर चलि आबि आ आँखि से ओझर भेला उपरांतो हुनक सुर-लहरी ओही ठाम ठार भए सुनय के प्रयास करैत रहैत छलहुँ. धीरे धीरे समय बदलैत गेल, गीत बदलैत गेल मुदा जटा झा के अंदाज नहि बदलल. हाँ, हुनक माथक जटाक जगह कटिनगर केश लए लेलक, डिबियाक जगह हाथ मे लालटेन आबि गेल, गोरकी पतरकी के जगह गोरी है कलाइयाँ आ छत पे सोया था बहनोई आबि गेल मुदा जटा झाक ठेठी मे कोनो परिवर्तन नहि ! कालांतर मे वर्ग-प्रोन्नति परीक्षा मे बराबर फेल होएत-होएत जटा झा सतमा क्लास मे हम्मर सहपाठी बनि गेलथि. फेर त’ नियम सँ प्रातः दस बजे स्कूल जाए लेल बजाबो खातिर नित्य प्रति हमरा ओही ठाम आबि जाथि आ तेकर बाद दुन्नु गोटे साथे स्कूल जाई आ आबि ! स्कूलक परीक्षा मे जटा झा केँ हम्मर कॉपी देखि क’ लिखय के पूर्ण छूट छलन्हिये, अप्पन प्रश्न-पत्र के निपटा हम स्वयं अप्पन हाथ सँ सेहो हुनक कॉपी मे लिखी दियैक. तैं जटा झा सतमा सँ ल’ क’ नवमा क्लास धरि बेरोक-टोक पास होएत चलि गेलाह. शिक्षक-वृन्द सेहो जटा झाक सफलताक रहस्य सँ अनभिज्ञ नहि छलाह ! खैर पढाई लिखाई के गोली मारू आ सुनु एक गोट मजेदार गप्प !


बात अछि जखन हम सभ नवमा क्लास मे छलहुँ ! दशहरा मे गाम मे नाटकक आयोजन भेल छल. जटा झा ओरे सौं गीत-नाटक के अंध प्रेमी छलाह ! साओनक झूला मे मंदिर पर होमय वाला नाटक मे तेरहों राति जाइथ. राजा भरथरी स’ ल’ के सुल्ताना डाकू धरि कतेको नाटक के संवाद हुनका मुंह-जवानी रटल छलन्हि. आ जखन अप्पन तोतराह बोली मे ओ संवाद के भाव आ अभिनय के साथ बाजब शुरू भए जाथि त’ केहन सँ केहन गंभीर व्यक्ति के हंसी छुटी जाइक ! तखन दशमी मे नाटक के बात सुनि जटा झाक ख़ुशीक ठेकान नहि रहल. चट पता केलथि जे नाटकक आयोजक आ निर्देशक के छथि आ फट अप्पन अभिनय क्षमता के परिचय दए नाटक मे पाट प्राप्त करय के जोगार मे भीर गेलाह. निर्देशक महोदय सेहो सोचलाह कि जटा झा त' स्वयं जीवंत कॉमेडी छथि त' किए नहि कुनो सीन मे हिनक स्टेज पर चढा के दर्शक के गुदगुदैल जाय ! मुदा जटा झा के कहब जे बिना लिखल संवाद भेंटने हम अभिनय कोना करब ? से हुनका एक गोट कागज़ पर चारि लाइन लिख के देल गेल जे इएह थीक अहांक संवाद ! फेर जटा झा ओकरा मोन लगा के रटय लगलथि ! आ रोज राति मे ओकर रिहर्सल करए लेल ससमय निश्चित स्थान पर पहुँचि जाइथ. एहि तरहे नाटकक राति सेहो आबि गेल. आई जटा झाक जनम भरि सँ संचित अभिलाषा पूरय बला छलैन्ह. बेचारे सांझ मे भगवती के प्रणाम क’ अप्पन सफलता के कामना कय नाटक स्थल पर पहुँचि गेलाह ! झट द' एस्नो पावडर पोतवा के तैय्यारो भ' गेल्लाह. आब इंतिजार छलैन्ह त ओहि दृश्य के जाहि मे स्टेज पर हुनक एंट्री छलैन्ह. ओना जटा झा अप्पन प्रदर्शन के प्रति पूर्ण आश्वस्त छलाह. देखैत देखैत ओ दृश्य सेहो आबि गेल. डाकू सुरजन सिंह ओहि मार्ग स’ जाए बला सभ लोक के लुटी रहल छल. जे दिअ' मे आना-कानी कराए तेकरा खूब कए मारि रहल छल. टखने जटा झाक जोरदार एंट्री भेल.


डाकू सुरजन सिंह : अरे कौन है ? मालुम नहीं इस रास्ते से जो भी जाता है वो पहले सुरजन सिंह को चढाबा चढाता है !

जटा झा : अरे ! मारुम त' है ! मगर आपको मारुम नहीं कि हम त गरीब ब्रह्मण हूँ ! पूजता हूँ त' खाता हूँ नै त भुखरे सो जाता हूँ !!

डाकू : अरे बदजात ! सुरजन सिंह से जवान चलाता है ! चल जो भी है रख इधर !

जटा झा : भए हमरा पास त' एहे एगो पोथी आ एगो रोतकी (लोटकी) है. लो, अगर एहे र’ के आपका पेट भर जाए त' ख़ुशी से रे रो ! रेकिन याद रखो एगो गरीब बाभन का करपाना तुमको पड़ेगा !!

डाकू : अरे मुर्ख ! तुम्हारी आह तो मुझे बाद मे लगेगी ! ले पहले मेरी बन्दूक की आह संभाल !

एते कहि सुरजन सिंह अप्पन डाँर मे खोसल बन्दूक खींचि जटा झा पर तानि देलक.


बेचारे जटा झा लागलथि चिचिआबय. आ ले लूत्ती ! आब देखाला ना ताब फटाक स’ स्टेज सँ कुदि पडलथि. बेचारेक पैर माइक के तार मे ओझारयल आ झाजी अगिला पांतिक दर्शक सभक बीच मे धराम स’ खसलथि ! लोक सभ त’ हँसैत हँसैत पेट पकडि लेलक आ एम्हर जटा झा लोर-झोरे भरल लगलथि आयोजक आ निर्देशक कें गरियाबे ! लोक पुछलकन्हि जे एना किए केलियैक त' बेचारे कनैत-कनैत कहलाह जे देखलियैक नहि ओ बुरि डकुबा के केना फट द' बन्दूक तानि देरकै से .... ! ई त' जानि के हमरा अहाँ सभ फांसी पर चढेलहुँ ! एखन जौं स्टेज स’ कुदि के जान नहि बचाबितौंह त' सार गोरिये ने मारि देत रहे..... लोक सभ कहलकन्हि जे जाऊ पंडी जी, ई त ड्रामा ने छैक. मुदा जटा झाक तर्क सेहो कुनो कमजोर नहि छल. कहलाह जे ई त हम अहाँ ने बुझई छि़यैक जे ई ड्रामा छैक. जौं ओ सार डाकुबो ई बात बुझितैक तहन बन्दूक थोड़े निकालितई... आ कनेक देर ले मानि लेल जाऊ जे ओहो बुझि जेत्तैक जे ड्रामा छैक मुदा गोली बन्दूक बुझई छैक जे ई ड्रामा छैक ?? एखन जौं गोली छूटि जैतै तहन त' हम्मर प्राण गेल्ले छल....


हा..... हा....... हा ....... हा........... हा.........

जटा झा के ई जवाब पर तेहन ठहक्का बजरल जे नाटक मे मशगूल पात्र आ दर्शक सभ चौंक उठलाह ! लोक सभ हँसैत हँसैत कहे लागल कि जटा झा भारी बुरि छथि. मुदा हम आई सोचै छी जे गामक बुरिबक जटा झा के सेहो ई गप्प बुझल छलैन्ह जे गोली बन्दूक नाटक आ खेल नहि बुझैत छैक... काश ई बात आई देश, प्रान्त, भाषा जाति आ धरमक नाम पर खूनक होरी खेलय बला आतंकवादी आ अत्याचारी सेहो बुझैत जे गोली बन्दूक अप्पन पराया नहि बुझैत छैक तहन फेर बाते कि... काश ई बात जौं ई व्याभिचार के प्रश्रय दिअ' बला धर्म आ समाजक ठेकेदार तथाकथित नेता लोकनि बुझि जैतैथ तहन त' धरतीये स्वर्ग भए जाएत... मुदा ई सभ जटा झा जेकाँ बुरिबक थोड़े छैथ कि हिनका पता रहतन्हि जे गोली बन्दूक किछु नहि बुझैत छैक.......... आ पाठक लोकनि ! एक बात सुनि लिअ' ! ई गप्प पढ़ी अहाँ सभ हमरा पर गोली बन्दूक नहि तानब... किए त हम अहाँ बुझई छिईक मजाक मुदा गोली बन्दूक थोड़े बुझैत छैक !!

दू गोट मलयालम कविता

1. हम लिखि रहल छी

बाट पर खसल मोरक ओस पर
हम लिखि रहल छी, तोहर नाम

मूल कवि- श्री के. सच्चिदानन्दन,
मैथिली अनुवाद- श्री सुभाष चन्द्र


जेना, पहिनहुँ कोनो कवि
लिखने छल नाम- स्वतंत्रता केँ
हरेक वस्तु पर।
तोहर नाम लिखय लागी त'
मिटेनाय कठिन भ' जेतय
धरती आ आकाश पर
क्रान्तिक संग
प्रेमक लेल सेहो स्थान छै

मलयालम कें प्रख्यात कवि के.सच्चिदानंदनक कविता कें पंजाबी में अनुवाद डा. बनीता कएलीह,जे ‘‘पीले पत्ता का सपना’’शीर्षक सँ पुस्तक रूप में साहित्य आकादमी, दिल्ली द्वारा वर्ष 2003 में प्रकाशित भेल। ई कविता एहि पंजाबी कविता संग्रह सँ लेल गेल अछि, जकर पंजाबी सँ हिन्दी अनुवाद "सुभाष नीरव" कएलाह। मैथिली में कविताक अनुवाद हिन्दी सँ कएल गेल। श्री. सच्चिदानंदन साहित्य अकादमी कें सचिव रहि चुकल छथि आ हिनक बहुत रास कविताक अनुवाद भारत आ विश्वक कतेको भाषा में भ' चुकल अछि।


तोहर नामक सजौट पर
सूति रहल ही हम
तोहर नामक चहचहाटक संग
जागैत छी हम
जतय-जतय हम स्पर्श करैत छी-
उभरैत अछि तोहर नाम
झटैत पात कें घसमैल रंग पर
पुरान गुफाक स्याह दीवार पर
कसाईक दोकान कें केवाड़ पर
भीजल रंग पर
नबका स् पर
चांदनी के फड़फाइत पाँखि पर
कॉफी आ नून पर
घोड़ाक नाल पर
नर्तकी केँ मुद्रा पर
मधु औ विष पर
नींद पर, रेत पर, जड़ि पर
फाँसीक तखत पर
मुर्दाघर के सर्द जमीन पर
“मसान-शिला के चिक्कैन पीढ पर।



2. हमरा कि बूझ

हम दूनू बच्चा छीं
जे माय-बापक खेल बेल रहल छी-
जानैत नहि छी- आलिंगनक अर्थ
हमरा कि बूझल चुम्माक विद्युतमयी प्रवाह
बस, एहिना स्पर्श कय लैत छी
किछु पात...
किछु फूल...
किछु फल...
बड्ड ममतांक संग निहारैत अछि प्रकृति हमरा
जिनगी में ठसाठस मरल
वं”ा- तृ’णा कें
मद्धिम लौ कें
अमर होबाक एहि
अर्थहीन इच्छा में
सुनू....
राति आँगन में दौडै़त चलि जा रहल अछि।

बाढि पर एक कवि- डॉ. गंगेश गुंजन

"दु:खे टा चारु कात छै आ जी रहल- ए लोक
ताकैत आसरा कोनो दुःख पी रहल- ए लोक !
घर-द्वारि दहि गेलैक सब बच्चा टा छै बांचल
रेलवेक कात, बाट-घाट जी रहल- ए लोक !
सांझो भरिक खोराक ने छैक अगिला फसलि धरि
जीबा लए ई लाचार कोना जी रहल- ए लोक !

कवि- डॉ. गंगेश गुंजन,
74- डी, कंचनजंघा अपार्टमेंट,
सेक्टर- 53, नोएडा- 201 301


सबटा गमा क' जान बचा आबि त' गेलय
आब फेकल छुतहर जेकाँ हद जी रहल- ए लोक !
जले पहिरना, बिछाओन जले छैक ओढना
जबकल गन्हाइत पानि-ए खा पी रहल - ए लोक !
सब बर्ष जकां एहि बाढि मे कारप्रदार
रिलीफ नामें अपन झोरी सी रहल किछु लोक !
चलि तँ पडल- ए जीप- ट्रक - नावक से तामझाम
आब ताही आसरा मे बस जी रहल- ए लोक !
कहि तं गेलाह- ए परसू- ए दस टन बंटत अन्न
एखबार- रेडियो भरोसी जी रहल- ए लोक !
घोखै तँ छथि देश मे पर्याप्त अछि अनाज
सडओ गोदाम मे, उपास जी रहल- ए लोक !
उमेद मे जे आब आओत एन जी ओ कतोक
द' जायत बासी रोटी, वस्त्र, जी रहल- ए लोक !
अछि कठिन केहन समय ई राक्षस जकाँ अन्हार
किछु भ' रहल अछि तय , तेँ त' जी रहल- ए लोक !

दर्पण- श्री सतीश चन्द्र झा

अछि दर्पण टांगल देबाल पर
देखि लेब किछु क्षणिक ठहरि क'।
करब कर्म जे अपन दिन भरि
आयत मुख पर भाव उतरि क' ।
बनतै नहि प्रतिबिम्ब झूठ के
उचित कर्म सँ छिटकत आभा।

कवि- श्री सतीश चन्द्र झा, व्याख्याता, दर्शन शास्त्र, मिथिला जनता इंटर कॉलेज, मधुबनी


अनुचित करब मोन किछु टोकत
विकृत बनत मुँहक शोभा ।
जहिया बैसब असगर कहियो
करब जीवनक लेखा-जोखा।
झहरत बूँद आँखि सँ ढप-ढप
रंगहीन लागत जग धोखा ।
छै बताह इ अहं मोन के
जौं जागत नहि सूतत कहियो।
बाँधि लिअ सामर्थ्य हुअए त'
भरि मुठ्ठी बालू के कहियो।
करब अपार अर्थ धन संचय
संस्कार नहि उपजत धन सँ ।
बिलहि देत संतानक भविष्य
दुख-सुख सबटा भोगब तन सँ।
चलू ताकि क' आबू कखनो
अछि धरती जे पैरक नीचाँ।
देखियौ सुन्दर कतेक लागै छै
ओस दूभि पर जेना गलैचाँ ।
आसमान अछि दूर एतय सँ
नहि देखू अछि मात्र कल्पना ।
लागत चोट पैर मे कहियो
जीबू जे अछि ल' क' अपना।

दुविधा- श्री संतोष कुमार मिश्र

असगर मे बैसिक'
अपनापर बिचारै छलहुँ
अप्पन भावना के हेराक'
अनुभव के डुबाक'
हम बड सोचलहुँ

Santosh Kumar Mishraकवि- श्री संतोष कुमार मिश्र। जनकपुर (नेपाल) निवासी श्री संतोष कुमार मिश्र जी काठमाण्डू (नेपाल) मे एकटा बहुराष्ट्रीय कम्पनी मे अधिकारी छथि। मैथिली साहित्य सँ विशेष लगाव आ मैथिली मे एखन धरि “पोसपूत" आ "उदास मोन” (कथा संग्रह), एना (आईना) (सम्पादित कविता संग्रह) प्रकाशित आ एखन एकटा कविता संग्रह "एना किए" प्रकाशनाधीन छन्हि। सम्पर्क- 00977-98510-11940 (मोबाइल)


जे हमरा मे तीव्रता के कमी अछि
हमरा निश्चय भ' गेल
जे हम बड सोचलहुँ
जे हम अहाँक प्रेमक लागक नहि छी
मुदा ई भइयो नहि सकैए की
अहाँके पहिल बेर देखिक'
हमरा मोन मे व्याकुलता आएल
जाहिके हम वर्णन नहि क' सकैत छी
दोसर बेर भेट होइते
हम अहाँ सँ परिचित भेलहुँ
ताहिके बाद अहाँ लग रहबाक
इच्छा हमरा मे जागल
अहाँक संग जे हमर
भावनात्मक सम्बन्ध रहय
से बड उपद्रवी रहय
ते हम बीतल भरि राति
भगवान सँ प्रार्थना करैत
हम बड सोचलहुँ
जाहि सँ हम सभ्य भ' गेलहुँ
ई बात हमरा बुझ' मे चलि आयल छल
जे हम नियंत्रण मे नहि छी
आ अपन नियंत्रण गुमा रहल छी
हम समय के पकड' चाहलहुँ
मुदा हमर भावना समय के छोडि देलक
पहिने हम प्रेम मे परलहुँ
आ बाद मे बुझलहुँ
ई एक सामाजिक अपराध छैक ।

अंतिम फेसबुक अपडेट

लेखक: आदि यायावर मूलनाम: डा. कुमार पद्मनाभ पीयूस आफिस पहुँचि गेल छलाह. सबसँ पहिने अपन लैपटॉप खोलि फेसबुक में स्टेटस अपडेट केलाह आ ...