गरिमा आओर पलास

कथा, भाग-2: लेखक:- राजीव रंजन लाल, मोडेरेटर: केशव कर्ण (समस्तीपूरी)

करण समस्तीपुरी द्वारा लिखल पहिल भाग मे पढ़लौंह, "बचपन से तरुनाई धरि संग चलनिहार गरिमा आ पलासक सतत प्रेम, तमाम वर्चस्व आ विषमताक कात करैत जीवन पथ मे दुन्नु लोकनिक संग आनि देल्कैन्ह. मुदा भावनात्मक द्वन्दक नहि रोकि सकल !" एक पुरुषक अहम् आ नारिक स्वाभिमानक टकराव कोना होएत छैक...., राजीव रंजन लाल जी द्वारा लिखल कथाक एहि भाग मे पढू !!
पलास के गरिमा के प्रति प्रेम अगाध छल आ ओ गरिमा के कष्ट बुझय छलखिन। से ओ जहिया जरूरत होय, गरिमा के मदद करय छलखिन्ह। विवाहोपरांत पलास निश्चय केलैथ जे ओ अपन आलस्य के छोड़ि किछ काज धंधा के अपना के लगौता। गाम में बैस गेला से किछ अकर्मण्यता सेहो आबि गेल छल पलासक जीवन शैली में मुदा ओ कृतसंकल्प भ’ एकटा प्राइवेट नौकरी ज्वॉइन क लेलैथ। ओ एकटा फर्टिलाइजर बनाबय बला फैक्टरी में सुपरवाइजर पोस्ट पर नियुक्त भेलाह। किछ दिन त’ सभ किछ ठीक चलल मुदा एहि काज में दिन राति के ठिकाना नहि छल आ बहुत माथापच्ची बुझेलैन पलास के। हुनका अंदर से लागैत छल जे हुनका भेटल काजक स्तर हुनक योग्यता से बहुत कम छैक। गाम बला बाबूशाही सेहो खतम छल। कोनो मैनेजर आबि के दु बात कहि देय आ पलास के खून के घूंट पीबय पड़य। डेरा पर अयला पर फैक्टरी के तामस कपार पर रहय छलैन्ह। गरिमा सेहो एहि बात के बुझैत रहथिन्ह आ पलास के बहुत हिसाब से शांत राखय के कोशिश करय छलखिन्ह। गरिमा पलास के नीक बेजाय के ख्याल राखय के कोशिश करय छलैथ आ एहि से पलास के धधकैत दिमाग के किछ शांति भेटैन्ह। क्रमश: पलास पर ऑफिस के बात बेसी हावी होयत गेलय आ गरिमा के समझाबै के असर क्षीण। आब पलास के लागैत छल जे गरिमा के हुनक स्वाभिमान के कोनो चिंता नहि छैन्ह। पलास के गरिमाक तुलना में आधो से कम तनख्वाह भेटैत छल। हुनक दिमाग पता नहि कोना, एहि बात के तुलना करय लागल। पलास के इहो लागय लागल जे शायद गरिमा हुनका एहि कारणे कम योग्य बुझैत छथिन्ह आ एहेन तुच्छ नौकरी के तरफदारी करैत छथिन्ह। मानव मन के बुझनाय बहुत कठिन होयत अछि आ ओ कखन कोन बात पर विचलि जेतै सेहो अनुमान लगेनाय कठिन।

सात–आठ दिन पहिने कोनो बात पर पलास मैनेजर से मुँहा-मुँही भ’ गेल आ ओ नौकरी के लात मारि आबि गेलखिन्ह। दुपहरिये में घर पहुँच गेलैथ। दिमाग में दस तरह के बात घुरिया रहल छल। कखनो अफसोस होय जे बेकारे नौकरी छोड़ि देलिये आ कखनो हुनकर मोन कहय जे भ’ गेलै सैह उचित छल। घर अचानक से खाली लागय लागल। हुनका कहियो एतैक खालीपन महसूस नहि भेल छल। गरिमा साँझ में ऑफिस सँ आबैत रहथिन्ह। पलास के अचानक महसूस भेल खालीपन में गरिमा के कमी खलल। पलास के वैचारिक मतभेद हुनका गरिमा से बहुत दूर क देने छल। गरिमा के सेहो एहि बात के अनुमान लागि गेल छल आ एम्हर किछ दिन से ओ पलास के नौकरीक विषय में किछ नहि पूछय छलखिन्ह। पलास के मन में कतओ दुविधा आ अंतर्द्वंद चलि रहल छल। गरिमा नीक आ कि पलास नीक। पलास के लेल दुनु दु विचारधारा के प्रतीक छल आ कतओ से हुनक मोन बारंबार हुनका से कहि रहल छल कि गरिमा के विचार हुनक अपन विचार से नीक छल। किछ देर आउर बीतला पर ई विचार एतैक हावी भ’ गेल पलास के दिमाग में जे ओ प्राय: स्वीकार क’ लेने छलैथ जे एहि प्रकरण में ओ गलत छैथ। दिमाग किछ शांत भेल आ ओ गरिमा के इंतजार करय लागलाह।

सांझ भेला पर गरिमा अपन समय से आबि गेलखिन्ह। घर में पहिने से पलास के देखि हुनका मोन में शंका भेलनि मुदा मुसका के पुछलखिन “कि बात, आय पहिने आबि गेलियै”।
“अहाँ के बेजाय लागल कि, हमर घर पहिने एनाय?” पता नहि पलास कोना अचानक से उखड़ि के जवाब देलखिन।

“नहि-नहि, से किया कहैत छी? ओनाही पुछलौं, जे मोन ठीक अछि कि नहि।” गरिमा के जवाब छल। ”आय मैनेजर से बाता-बाती भ’ गेल छलै। नौकरी छोड़ि के आबि गेलियअ। पता नहि अपना के कि बुझय जायत छैक। जेना लागय छै ओकर बाप के कर्जा धारणे छियै।” पलास अपन बात गरिमा से कहलखिन। हुनका मोन में छलैन जे गरिमा हुनक विचार के ऊपर राखैत हुनक समर्थन में बाजथिन। मुदा गरिमा के जवाब छल “आय काल्हि कतेक मुश्किल से नौकरी भेटय छै आ सौंसे ई परेशानी त’ रहबे करैत छै। अहाँ के नौकरी नहि छोड़बा के चाही छल।”
एतबा सुनैत पलास के स्वाभिमान जागि उठल आ ओ गरिमा के कठुआयल बात कहय लागलखिन्ह। कहैत काल हुनका विचार नहि रहि गेलैन जे गरिमा हुनका सँ वियाह करय ल’ तखन तैयार भेल रहथिन्ह जखन पलास गाम में बैसल रहैथ। गरिमा के माँ-बाबूजी के कनेक आपत्ति सेहो छल, मुदा गरिमा के खुशी के कारणे एहि प्रस्ताव के स्वीकार केने छलखिन। “अहाँ के ई चिंता नहि अछि जे हमरा के गारि बात कहैत अछि, मुदा अहाँ के एहि बात के बड्ड अफसोस अछि जे घर में पैसा एनाय कम भ’ जेतय। बाहर त’ मजदूर जकाँ पेड़ैबे करय छी, अहुँ के लेल हम एकटा पैसा छापय बला मशीन भ’ गेल छी। अहाँ के की भेटय यै आ की नै भेटय यै से हम कहियो हिसाब किताब नहि करय गेलौं। आय अहाँ कमबै छी त’ हमरा गुलाम नहि बुझु आ कनेक हिसाबे से बाजू, नहि त’ ठीक नहि होयत।”

गरिमा स्तब्ध छलीह। एहेन प्रत्युत्तर के परिकल्पना गरिमा के नहि छल। हुनको स्वाभिमान जागि गेल छल आ सब किछ बुझैतो ओ अपना के काबू में नहि राखि सकलखिन आ ठोकले जवाब देलखिन। “हमहीं छलहुँ जे माँ-बाबूजी के नहियो पसंद भेला पर अहाँ संग वियाह केलौं। तखन अहाँ कोन कमबै छलियै आ हमरा कोन पैसा के मोह छल। ना हम अहाँ के नौकरी करय ल’ कहलौं ना छोड़य ल’। हम किया अहाँ के पैसा छापय के मशीन बुझब। हमरा कोन खगती अछि पैसा के। अहीं झखै छी पैसा के लेल आ नौकरी के लेल। आब हमरा बुझा रहल अछि जे अहाँ के हमरा से नहि, हमर नौकरी से प्यार अछि। अहाँ के नौकरी नहि, लाटसाहबी चाही, से त’ कतओ भेटय बला नहि अछि। कनिये के पाय पर गुलछर्रा उड़ाबय चाहैत छी त उड़ाउ। हम त कहियो नहि रोकलौं अहाँ के।”
“हम कि शराब, सिगरेट में पैसा फेकैत छी। अखन एको दिन नौकरी छोड़ला नहि भेल हमर आ अहाँ अपन पैसा दिखा रहल छी। हम अहाँ के भरोसे जिनगी नहि काटि रहल छी। एहेन एहेन बहुत पाय बला देखने छी हम। पाय कमाबै छी त’ अहाँ नाँगड़ि बला नहि भ गेलौं से नाचि रहल छी।” पलास के बाजय में सम्हार नहि छल।
बात बिगड़ैत गेल आ गरिमा कानय लागलखिन्ह। पलास के अचानक बोध भेलनि जे ओ बहुत किछ अनर्गल कहि देलखिन्ह जेकर जरूरत नहि छलय। ओ चाहैत रहथिन्ह जे गरिमा के जा के सम्हार लैथ मुदा स्वाभिमानवश ओ उठि नहि सकलाह। फूसि अहंकार के अधीन भ’ गेल छलैथ पलास। अचानक सँ युगल जोड़ी के केकरो नजरि लागि गेल छलय। एक छत के नीचा रहितो अनजान भ’ गेलैथ गरिमा आ पलास।

गरिमा के हृदय के आघात पहुँचल छल आ ओ अंदरे-अंदर घुलय लागलखिन। शरीर क्षीण होयत गेलैन आ ओ अखन बीमार छलीह। पलास के लेल ई विकट अवस्था आबि गेल। ओ कि करौथ। अपन प्यार के देखौथ की स्वाभिमान के। ताहि पर आय सांझ में गरिमा के माँ-बाबूजी शादी के बाद पहिल बेर इलाहाबाद आबि रहल छथिन्ह। हुनका सभ के किछियो भनक नहि छैन्ह एहि सप्ताह बीतल बात सभक। गरिमा सेहो नहि चाहय छलखिन्ह जे अखन हुनक माँ-बाबूजी इलाहाबाद आबैथ। ओ हुनका सभ के दुखी नहि देखय चाहैत रहथिन। एक-दु बेर त’ मना केलखिन, लेकिन गरिमा के माँ नहि मानलखिन जे पाहुन सेहो ऑफिस चलि जायत छथिन्ह त’ तोहर सेवा-सुश्रुषा के करतौ। पलास केना ई सभ के मैनैज करथिन्ह से कठिन प्रश्न छल हुनका लेल।
(क्रमशः..............)

कहानी’क अगिला भाग लिखबाक लेल टिप्पणी द्वारा सूचित करु. पहिने आऊ पहिने पाऊ सिद्धान्त लागू रहत.

कथा'क      प्रथम भाग ।  दोसर भाग  । तेसर भाग  ।  चारिम आ अंतिम भाग

गरिमा आओर पलास

कथा, भाग-१: लेखक एवम मोडेरेटर: केशव कर्ण (समस्तीपूरी)
गरिमा एखन ऑफिस सँ अएले छलीह. चाह’क केतली गैस पर चढा क' वर्षा मे भीजल केश के सुखाबए लागलीह. फेर चाह आ रेडियो ल'क' बालकनी मे आबि गेली. आल इंडिया रेडियो पर 'बरखा बहार आयी रस की फुहार आयी' बाजि रहल छल. सामने फिल्ड मे पलासक फूलक उज्जर धप-धप चद्दर बिछल छल. गरिमा सोचए लागलीह, हुनको पलास त' हुनक हर ख़ुशी ले अहिना आंखि बिछेने रहैत छल. एक बेर गरिमा कहने छली जे हुनका आमक अंचार बड़ पसंद छैन्ह आ पलास अगले क्षण ताख पर राखल शीशा वाला बोइयामक एक हिस्स एक्के बेर मे पार क' देने रहथि. भन्ने एहि फेर मे बोइयाम खसि क' टूटल, हुनक हाथ कटल आ माताजी के डांट सेहो सुनाए पड़ल. गरिमा’क कैमरा वाला मोबाइल फ़ोनक बड़ शौक छलैन्ह. सांझे मे हुनका एक गोट सरप्राइज गिफ्ट भेंट गेलन्हि. डिब्बाक भीतर एक सोनी एरिक्सन मोबाइल फ़ोन’क अलावे एक गोट पुर्जी जहि पर पिंक स्केच पेन से लिखल छल "इट्स माय प्लीजर" - पलास! फेर त' विद्यार्थी जीवन मे मासक बाँचल दिन कोना गेल से त' पलासे के मोन छैन्ह कि हुनका सँ एक बेर "आज कल तुम शेव क्यूँ नहि करते ?" पुछए वाली गरिमा कें.
एहि कहानी’क पहिल भाग सँ मैथिली साहित्य’क इतिहास मे एक अध्याय आओर जुड़ि गेल. एहि सँ पहिने कहियो एहेन नहि भेल छल जे एक कथा केँ कएक लेखक मिलि जुलि केँ लिखने हो. प्रत्येक लेखक केर अलग भावना. कथा’क पहिल भाग लिखताह किओ एक लेखक, दोसर भाग मे उठा पटक करताह केओ दोसर लोक, उत्कर्ष पर चढेताह किओ तेसर आ नहि जानि अन्तिम लोक अपन सोच सँ कहानी केँ बिल्कूल अलगे अन्त दऽ दैथि. सब मिला केँ प्रत्येक लेखक के अपन भावना’क हिसाब सँ कहानी मोड़ लेत आ पाठक केँ एक रुचिगर कथा पढ़बाक लेल भेटतन्हि.हमरा बुझने आन दोसरो वेबसाइट पर एहेन प्रयोग’क सुरुआत काएल जायत मुदा केशव जी’क लिखक एहि कथा-क मैथिल साहित्य’क इतिहास मे सम्मान’क सँग विद्यमान रहत.

आदि यायावर



पलास आ गरिमा बचपने सँ संगी छलथि. स्कूल, कॉलेज, प्रतियोगिता परीक्षाक तैय्यारी आ फेर इंटरव्यू. बचपन से तरुनाई धरि जिनगीक सफ़र मे हर कदम पर पलास गरिमा के साथे छलथि. मुदा एतहि से दुन्नु लोकनिक रास्ता अलग भ' गेल्लैन्ह! गरिमा सफल भए सी. पी. डबल्यू. डी. मे नौकरी करए ईलाहाबाद चलि गेलीह आ पलास असफल भए अप्पन गाम ! किछु दिन धरि त' फ़ोन, एस.एम.एस. मेल आ चैट के दौर सकुशल चलैत रहल. मुदा ई दूरी दुन्नु लोकनिक आओर करीब आनि देल्कैन्ह. साल बितैत-बितैत पारिवारिक सहमति सँ दुन्नु लोकनि परिणय सूत्र मे बंधि गेलथि. पलास अल्लाहाबाद आबि गेलथि. गरिमाक जिनगी कें त' मानु जे खुशी के पाँखि लागि गेल होए. मुदा फेर शुरू भ' गेल टकराव, एक पुरुषक अहम् आ एक नारीक स्वाभिमान’क !

 

जे कहानी’क अगिला भाग लिखबाक लेल टिप्पणी द्वारा सूचित करु. पहिने आऊ पहिने पाऊ सिद्धान्त लागू रहत.



कथा'क      प्रथम भाग ।  दोसर भाग  । तेसर भाग  ।  चारिम आ अंतिम भाग



एना कते दिन (कथा) - सतीश चन्द्र झा

- श्री सतीश चन्द्र झा

स्वच्छ आ निर्मल आँखिमे जेना नोर झिलमिलाए लगैत छैक अथवा ओसक बुन्न फूल पर चमकऽ लगैत छै, तहिना ओकर ठोरो पर मुस्की नुका नञि सकैत छलैक। कखनहु कोनो बात हो कोनो प्रसंग हो ओकर मुस्की सुहागिनक लाल-लाल सिन्दुर सँभरल सोउँथ जकाँ हरदम चमकैत रहैत छलैक। सैकड़ो युवतीक छटाक तुलना मे ओकर आकर्षक व्यक्तित्वक मुस्कीक कोनहु विकल्प नहि छलैक। किओ देखै वा नञि, हमर आँखि ई सुखक लेल सदैव उत्सुक रहैत छल।कक्षामे ओ हमरे पाँजरवला बेन्च पर बेसैत छल, दिनमे कइएक बेर ओकर आ हमर आमना-सामना होइत छल, जखन देखु प्रसन्न जखन गप्प करु वैह चंचलता सँ परिपूर्ण, अपन छटा केँ आवश्यकतासँ बेसी आकर्षक बनेबामे प्रयत्नरत, अनुभा हमरा लेल प्ररेणा छल। ओकर मुस्की हमरा एतेक प्रभावित केने छल जे हम एक दिन पुछिए देने छलियैक-

Satish Chandra Jhaलेखक- श्री सतीश चन्द्र झा,
म.न. 119, क्रॉस रोड, संत नगर
बुराड़ी, दिल्ली- 110084
सम्पर्क- 9810231588


अनुभा! एतेक मनमोहक मुस्की अहाँकेँ कतऽ सँ भेटल?
ओ हमरा दिस ताकि गंभीर भऽ गेल छल आ पुन: एकटा वैह आकर्षक छटावला मुस्की दऽ देने छल, बुझु जे ओ हमर उतर दऽ देने छल।

मुदा ओहिसँ हमरा संतोष कतऽ? हम तऽ ओकर चान एहन मुखमंडल सँ सुनऽ चाहैत छलहुँ। हमर बड़ जिद्द पर ओ कनेकालक वास्ते गुम्म भऽ गेल फेर कहलक-ई तऽ हमर स्वभाविक गुण अछि, ई नैसर्गिक अछि, कोना कहु जे कतऽ सँ भेटल।
बातो सत्ये छलैक, किञो कोना कहि सकैत अछि जे हँसब बाजब, कानव कखन ककरा कतऽ सँ भेटलै, हमहु केहन बातऽ करऽ लागल छलहुँ।
हमरा ओहिना स्मरण अछि जे परीक्षाक व्यस्त दिन छल, ओहि समय कखन साँझ होइत छल, कखन खेबाक बेर होइत छल, किछु पतो नहि रहैत छल, किताबक पन्ना आँखिमे, नचैत रहैत छल, नील रोसन इ सँ लिखल 'नोटक' वाक्य ओहिना दिमाग पर आच्छादित रहैत छल, एहने व्यस्तता सँ भरल दिनमे एक दिन एकाएक भेट भेल छल अनुभा सँ, कने ध्यान दऽ देखताहुँ तऽ उदास भऽ गेल छलहुँ-जगरना सन आँखि, ठोर पर पपड़ी जमल आ ओ मनमोहक मुस्की नहि जानि कतऽ हरा गेल छलैक, पूरा हालत अस्त-व्यस्त। ओकर एहन हालत देखि नहि जानि मनमे केहन-केहन बात आबि रहल छल, छातीक धड़कन अपन दैनिक गतिसँ तेज भऽ गेल छल-हम घवड़ायले भावे पुछलियैक-कि भेल अनुभा?
ओ चुप्प छल।
ओकरा चुप्प देखि हमरा रहल नहि भेल, ओकर दुनु कान्ह के डोलबैत पुछलियै-आखिर बात की अछि अनुभा? किएक ने बजैत छी? कहुने जे कि भेल?

ओ मुस्कीक व्यर्थ प्रयास करैत कहलक-संजू! हमर परीक्षा खराब भऽ गेल अछि, हम ठीक सँ लिखि नहि सकलहुँ अछि, एहि वर्ष पासो होयब असंभव बुझाइत अछि, आ ओकर आँखि सँ नोर खदसि पड़ल छलैक।
सान्त्वना दैत हम कहलियै-केहन बात करैत छी अनुभा, ई कोनो एहन बात तऽ नहि जाहि लेल अपन जीवने बदलि देल जाए, आदमी अपन स्वभाविक स्वभाव बिसरि खंडहर बनि जाए। अहाँ बताहि तऽ नहि भऽ गेलहुँ अछि अनुभा? देखु तऽ अपन हालत कि सँ की भऽ गेलहुँ अछि। देखु अनुभा, मेहनति करब हमर कर्तव्य थीक, सफलता, असफलता ई तऽ हमर हाथमे नहि अछि, तखन एतेक चिन्तित हैब व्यर्थ थीक। ई तऽ सर्वविदित छैकने, जे महाभारतक युद्ध मे श्री कृष्ण जनैत छलथिन्ह जे अभिमन्यु जे युवावस्थाकेँ प्राप्ते केने छल, चक्रव्यूहमे मारल जायत, यद्यपि ओ बचा सकैत छलथिन्ह तथापि ई कहि जे होबाक छैक से भइए कऽ रहैत छैक आ अभिमन्यु अपन कर्तव्यकेँ खूब नीक जकाँ निमाहलक। हुनक आँगा तऽ हम अहाँ...।
अनुभा बाजल-नहि संजू! अहाँ नहि जनैत छी, एहि वर्ष पास होयब हमरा लेल बड़ आवश्यक अछि, बेर-बेर असफलता सँ हमर स्थिति केहन भऽ गेल अछि से अहाँ जनैत छी?
हम उदास भऽ कहलियै-कि करबै अनुभा, जे होबाक रहैत छैक से तऽ भइएकऽ रहैत छैक।
प्रयास करितो ओ मनमोहक मुस्की अनुभाक मुख पर नहि आबि सकल छलै आ ओ विदा भऽ गेल छली।
किछुक दिन बाद ओ आयल छली, वैह हालति, ओहिना खिन्न, वैह उदासीक रुप।
हम पुछलियै-अहाँक भूत एखनधरि नहि उतरल अछि कि?
ओ मन्हुआयले मोन सँ कहलक-उतरि जायत। जे होबाक छल से तऽ भऽ गेल, आब कथिक लेल कानब आ कथीक भूत। ई किताब अनालहुँ अछि से लऽ लिअ।
हम आश्चर्य भऽ पुछलियैक-की अहाँ आगू नहि पढ़व? पढ़ाई-लिखाइ तऽ भागयक खेल अछि-किछु दिनक बाद हमर विवाह भऽ रहल अछि फेर केहन पढ़ब लिखब ओकर उत्तर छल। मुदा?
मुदा कि संजू? जँ किछ, कहबाक हो तऽ कहि दिअ, नञि जानि फेर भेट हैत कि नहि। हम तऽ अपन मनक गप्प कहबा लेल छलहुँ कि बीचहि मे...जै अहाँके किछु कहबाक हो तऽ कहि दिअ....लेकिन हमहु किछु कहि नहि सकल छलियैक।

हमरा लागल जेना ओ विवश छली आ विदा भऽ गेल छली मुदा एक तुफान सन बिहाडि़ छोडि़ गेल छली जाहिसँ हमर अन्त: करण आन्दोलित भऽ गेल छल, जे आइयो शांत नहि भऽ सकल छल आ कतेको प्रश्र हमर मनमे अउनाइत रहल हम किछु कऽ नहि सकलहुँ।
आब हमहुँ बैकक नौकरी करऽ लागल छलहुँ, एहि वर्ष गृहस्थी जीवन मे प्रवेश केने छलहुँ। आफिस जयबाकाल पत्नी कहने रहथि-हे सुनै छी, आइ कने जल्दी चलिआयब आइ साँझमे अस्पताल जयबाक अछि। से किएक? कि अपस्तालक....

धूर जाऊ-अहाँके तऽ हरदम हँसीए मजाक बुझाइत अछि, हमर गामक जे फुचाइ बाबू छथिन ने, तिनके बेटी अनुभा अस्पतालमे भर्ती छैक, कने जिज्ञासा कऽ लेनाइ जरूरी ने छैक-हँ...हँ अवश्य, यैह सब तऽ समाज में, परिवारमे नाम रहि जाइत छैक, मुदा अनुभाक नाम सुनितहि हमर मन डरा गेल छल, मनमे एक अजीब सन भयक संचार होमऽ लागल छल, मुदा मन के सम्हारैत ऑफिस विदा भऽ गेलहुँ।

साँझ मे अस्पतालक वास्ते विदा भेलहुँ, मुदा रिक्सा पर मन घ बड़ा रहल छल आ रहि-रहि कऽ एक्के बातक डर भऽ रहल छल जे बैह अनुभा तऽ नहि अछि। एहि बात सँ भरि देहमे पसेनाक बुन्न छोडि़ देने छल, जेबी सँ रूमाल बहार कऽ हम पोछ लागल छलहुँ। जाड़ोमे पसेना छुटि गेल, कि अस्पतालक डर होइत अछि? नहि...नहि एहन बात नहि छैक, ऑफिस सँ अएलाक बाद तुरन्ते विदा भऽ गेलहुँ अछि ताहि कारण मन कने थाकल बुझाइत अछि-हम पत्नीक बातकेँ अनठियबैत कहने रहियैन्ह।

अस्पताल पहुंचलहु तऽ ओहिठाम हड़बिरड़ो उठल छल, डाक्टर, नर्स आ कम्पाउण्डर सब किञो इम्हर सँ ओम्हर दौड़-बरहा कऽ रहल छल। ऑपरेशन घरक एक कोनमे बैसल शोक संतप्त परिवार दिस हमर पत्नी चलि गलीह आ गप्प केलाक बाद ओहो उदास भऽ गेल छलीह, एहि सबटा घटनाक हम मूक दर्शक बनल रहलहुँ जेना एही वास्ते आयल रहि।

ओहिठाम कातमे बैसल एकटा अति शोक संतप्त युवक दिस हम बढि़ गेल छलहुँ, हुनकहि सँ ज्ञात भेल जे हुनकहि पत्नीक आपरेशन भऽ रहल छनि, संगहि इहो कहलनि जे जहिया सँ हुनक विवाह भेलनि अछि तहिया सँ पत्नी अस्वस्थे रहैत छथिन आ ताहिमे दोसर बेर माँ बनि रहल छथि। डाक्टर लोकनिक कहब छनि जे बच्चा तऽ बाँचि जायत मुदा...

नहि...नहि...एहन बात नहि बाजू सभक रक्षा भगवान करैत छथिन, ऐना जँ अहिँ करब तऽ फेर....
एहि बीच कन्नारोहट उठि गेल छलै, ओहो युवक आम्हरे दौड़ गेल छलाह मुदा पत्नी सदाक लेल संग छोडि़ गेल छलथिन। हमरो आँखि सँ नोर टघरऽ लागल छल आ धीरे-धीरे हमहु ओम्हरे डेरा बढ़ा देने छलियैक।

अनुभा...! एकाएक ओकर शव देखि हमर बढ़ल डेग रूकि गेल छल। हमरा जकर अनुमान भेल छल ओ साक्षात सामने छल, वैह अनुभा जे कहियो हमर प्रेरणा छल। हम तऽ कल्पना मे नहि सोचने रहि जे अनुभा सँ फेर भेट हैत मुदा बिडम्बना देखु जे भेट भेवो कयल तऽ लाशक रुप मे। ओकरा संग बीतल युवावस्थाक दिन हमिरा ओहिना स्मरण आबऽ लागल छल, देह थरथराए लागल छल, कहुनाकऽ अपनाकेँ सम्हारैत कहुना कऽ डेग आगू बढ़ेने छलहुँ। डाक्टर लोकनि सँ ज्ञात भेल जे एकर मुख्य कारण जल्दीए दोसर बेर माँ बनब अछि कारण एक बच्चाक बाद शारीरिक रुपँ ओ ततेक ने कमजोर भऽ गेल रहथि जे दोसर बेरक हेतु ओ एखन तीन-चारि वर्ष धरि माँ नहि बनि सकैत छलीह, मुदा से नहि भऽ सकल छलनि...। बादमे हमरा दुखो भऽ रहल छल जे ओहि युवक केँ हम बहुत बातो कहि देने रहियैन जे पढि़-लिखि गेलाक बादो अहाँलोकनि भावुकताक प्रवाह मे ऐना ने बहि जाइत छी जे भविष्यक कोनो चिन्ते नहि। जँ आइ उचित परिवार नियोजनक कार्य प्रणाली पालन केने रहितहु तऽ आइ एहन परिस्थिति नहि अबैत, हमर बात पर ओ कानऽ लागल छलाह आ हमरो आँखि सँ नोर खसि पड़ल छल।

कतेक रास बात !!

बहुत दिन स हम अहि ब्लॉगक एक गोट निश्क्रिय सदस्य बन गेल छलहू | कारण एक ता समयक अभाव छल, दोसर किछू नव लिखबाक इच्छा हर बेर कलम थमा जाई छल| आई बहुत दिनक बाद कीछ समय भेटल ता अपने सभक समक्ष एक गोट प्रेम गीत प्रस्तुत कॅ रहल छी|

"इज़ोरिया राति में चंद्रमाक साथ,
पोखरिक भीड़ पर हाथ धेने हाथ;
किछू कहबाक मोन, मुदा बौक भेला 'बाल';
प्रेयसीक संग जेना व्यूह, कोनो जाल|

कतेक जन्म आहांक हम तकलहू अछी बाट,
संग आजू भेल सखी युगो-युगक बाद|

बिसारी दिय आई लोक-वेद आ समाज,
मिलाउ हमर प्रार्थना स आहा केर नमाज़|
प्रेम केर गीत सखी, प्रेम केर साज़,
प्रेमहि थिक धराक एही रंग केर राज़|

कतेक रास बात एहेन कतेक रास बात,
कहैत आ सुनैत भेल जाई अछि देखु प्रात||"

खस्सी आ चिकबा (लघुकथा) - सुभाष चंद्र

एकटा छागर छल, जकरा शुरूए सँ चिकबा पोसि रहल छल। खूब नीक जेकां रहैत छल छागर। चिकबा खूब ध्यान दैत छलै ओहि छागर पर। चिंतित रहैत छल छागरक प्रति। छागर कतओ इम्हर-ओम्हर नहि चलि जाय , कतओ रस्ता नहि बिसारि जाय, कतओ भुलता नहि जाय। हरियर-हरियर घास, कटहरक हरियर पात, रोटी ... सभ किछु खाय लेल दैत छलै छागर कें। कहुना स्वस्थ रहय, इएह मंशा रहैत छलैक।

Subhash Chandraलेखक- श्री सुभाष चन्द्र,
युवा पत्रकार सुभाष जी पत्रकारिताक संग हिन्दी आ मैथिली दुहू साहित्य मे सक्रिय आ "कतेक रास बात"क लेल नियमित रुप सँ लेखन। संगे एकगोट नव मैथिली पत्रिका निकालबा लेल सेहो प्रयासरत छथि। सम्प्रति "प्रथम इम्पैक्ट" नामक पाक्षिक पत्रिका मे कार्यरत आ दिल्ली मे निवास।
सम्पर्क-+91-98718 46705

- सम्पादक।



बीतैत समयक संग छागर खस्सीक रूप धारण कय रहल छल। समय बीतैत गेलै। आओर एकदिन चिकबा खस्सी कें लय क बाहर गेल। खस्सी अपना कें सभतरहें सुरिक्षत मानि रहल छल। कारण, संग मे रखबार छल चिकबा। खस्सी के एहि बातक अवगति नहि छलय जे आबय वाला पल केहन प्रलंयकारी हेतैक। ओ त सामने चिकबा कें देखैत छल आ निश्चिंत छल।

चिकबा, जे छागर के पालि-पोसि खस्सी बनोलक, खस्सी के अपनापन के एहसास करौलक। बच्चा सँ वयस्क बनयधरि सदिखन ओकरा सुरक्षा देलक। आब खस्सीक प्रति चिकबाक एतेक सिनेह कियैक रहय, ई त स्वयं चिकबे जाने।

ओ समय लगीच आबि गेलै जखन चिकबा स्वयं आ खस्सीक मध्य अन्तर स्पष्ट करैत अछि। चिकबा खस्सी के बाजार मे बेचि दैत छैक। ओ खस्सी के पुचकारैत बड दुलार सँ अपना लग बजाबैत अछि। खस्सी आबि जाइत छैक, कारण ओ चिकबा लग अपना कें पूर्ण सुरक्षित महसूस करैत अछि। लगीच अयला पर खस्सी के पकरैत अछि। खस्सी शांत, बिलकुल शांत। निस्तब्ध अछि। एकरा ओ सिनेहक एकटा रूप मानैत अछि। चिकबाक हाथ ओकरा पर धीरे-धीरे कसिया रहल छल, आ ....। कनी काल बाद ओ अपना कें बाँन्हल पबैत अछि। एकटा खँटा मे खूँटेसल। लाचार अछि, बेबस, अचंभित। खस्सी किछुओ बुझि नहि पाबि रहल छै। आखिर कियैक ओकरा संग एहन व्यवहार, सेहो चिकबाक हाथे। कारण सोच सँ परे। एकसरि ठाढ़ अछि, असमंजस मे।

किछु पल आओर बितला पर चिकबा अबैत अछि। हाथ मे कत्ता लेने। धरिगर आ भरिगर। खस्सी के साइत आब अनुमान लागि रहल छैक। कानि रहल छै। ओतय चिकबा शांत। बिलकुल शांत। जेना किछुओ नव घटना होमय वाला नहि होय। चिकबा के ज्ञात छैक, आबय वाला समय मे कि होमय जा रहल छै। कियैक भ रहल छै? एकर उत्तरदायी ककरा पर? तइयो शांत अछि। कोनो तिलमिलाहट नहि।

आब, खस्सीक पछिलुका दुनू पैर खींचल जा रहल छै। धड़ सीधा। कराहि रहल अछि खस्सी। शरापि रहल अछि चिकबा केँ। कनैत नहि अछि। कारण ओकर दम घूटि रहल छै। साँस लेबा मे तकलीफ भ रहल छै। एना मे कानल कोना जेतै? चिकबा आब निचैन भ कत्ता उठा कय ओकर गरिदन पर बजारि दैत छैक। गरिदन धड़ सँ विलग। एकदम सँ अलग। चहुँदिश शोणितक छींटा उड़ैत अछि। तइयो चिकबा शांत। एकदम शांत। जेना किछुओ भेलै नहि होइहि।

एहि शहर मे- सुभाष चन्द्र

एहि शहर मे
इजोरिया राति मे
एकसरि बैसला पर
मोन पड़ैत अछि अपन गाम
आन गामक चभच्चा पोखरि
प्राय: हमर नेनपनक कोनो संगी
एहि इजोरिया मे नाओ पर घूमैत होयत

Subhash Chandraकवि- श्री सुभाष चन्द्र,
युवा पत्रकार सुभाष जी पत्रकारिताक संग हिन्दी आ मैथिली दुहू साहित्य मे सक्रिय छथि। संगे एकगोट नव मैथिली पत्रिका निकालबा लेल सेहो प्रयासरत छथि। सम्प्रति "प्रथम इम्पैक्ट" नामक पाक्षिक पत्रिका मे कार्यरत आ दिल्ली मे निवास।
सम्पर्क-+91-98718 46705

- सम्पादक।


गबैत होयत कोनो फिल्मी प्रेमगीत
आ,
बसबिट्टी सँ उड़ल होयत कोनो चिड़ै
उडि़ क' गेल होयत आमक गाछी दिस
एहि शहरक धारक कात
हम एकसरि बैसल छी
आ
मौन पड़ैत अछि बेर-बेर अपन गाम
एहि शहर मे दस वर्ष रहलो पर हम
एहि शहर मे नहि छी
मोहल्ला मे छी मात्र एक 'किराएदार'
किराएदारक कोनो अस्तित्व नहि होइत अछि
कोनो शहर मे
चिड़ैए जकां किराएदार
एहि मोहल्ला सँ ओहि मोहल्ला मे चलि जाइत अछि
अथवा
चलि जयबाक लेल बाध्य कय देल जाइत अछि
हम छी, नहि छी
कोनो अस्तित्व नहि रखैत अछि एहि शहर मे
मुदा,
शहर मे रहब लाचारी अछि हमरा लेल
चिड़ैए जकां चाहे बसबिट्टी मे रही
अथवा आमक गाछी मे
हमरे जेकाँ शहर मे रहितो एकसरि अछि
यमुना
आओर, धीरे-धीरे जा रहल अछि
थाकल, ठेहिआयल, हमरे जकाँ।

उठू मैथिल भेलै भोर- विनित ठाकुर

जय जय मैथिल जय मिथिला
हर–हर गङ्गे जय कमला

Binit Thakurकवि- श्री विनित ठाकुर
जन्म- 01 मार्च, 1976 ई.
शिक्षा: बी. एड.
प्रकाशित कृति: बाँकी अछि हमर दूधक कर्ज
सम्प्रति: शिक्षक (प्रगति आदर्श ई. स्कूल, लगनखेल, ललितपूर, नेपाल)
स्थायी पता: मिथिलेश्वर मौवाही–६, धनुषा, नेपाल


उठू यौ मैथिल भेलै भोर
चुनमुन चिरैया करैय शोर
कोशी कमला अमृत जल धारा
आलस छोरु कहे भुरुकवा तारा

माटि पानिके लगाक छाती
बुढिया दादी गावे पराती
गाई महिष खोललक चरवाहा
हर लऽ विदाह भेल हरवाहा

मन्दिर मस्जिद मिथिलाक शान
रुप अनेक एकऽही भगवान
जनक सलहेशक ई कर्मभूमि
स्वर्ग समान बनाऊ मातृभूमि

अंतिम फेसबुक अपडेट

लेखक: आदि यायावर मूलनाम: डा. कुमार पद्मनाभ पीयूस आफिस पहुँचि गेल छलाह. सबसँ पहिने अपन लैपटॉप खोलि फेसबुक में स्टेटस अपडेट केलाह आ ...