नहि सोभैय’ रँगदारी,

कवि- दयाकान्त मिश्र

अहाँ विदेहक छी सन्तान,
राखू याज्ञवल्यक शान,
नहि बिसरु मन्डन अयाची,
वचस्पति विद्यापति केर नाम,
गौरव गाथा सँ पूर्ण धरा पर,
नहि करु एकरा सँग गद्दारी,
नहि सोभैय्य रँगदारी ।

हमर ज्ञान सँस्कृतिक चर्चा,
हई छल जग मे सदिखन,
छल शिक्षा’क केन्द्र बनल,
पहुँचल नहि शिक्षा’क किरण जखन,
आई ठाढ़ि छी निम्न पाँति मे,
नहि करु शिक्षा’क व्यपारी,
नहि सोभैय’ रँगदारी ।

किओ बनल सवर्ण’क पक्षधर,
किओ बनल अवर्णक नेता,
आपस मे सब षडयन्त्र रचि केँ,
एक दोसरा’क सँग लड़ेता,
अहाँ सँ मिथिला तँग भऽ गेल,
छोड़ू आब जातिक ठेकेदारी,
अन्हि सोभैय’ रँगदारी ।

बाढ़िक मरल रौदक झरकल,
जनता के आब कतेक ठकब,
गाम घर पर छोरी पराएल,
आब अहाँ ककरा लुटब,
भलमानुष किछु डटल गाम मे,
नहि फुँकू घर मे चिनगारी,
नहि सोभैय’ रँगदारी ।

एतबा धरि तॊँ करिहेँ सूगा

कवि-बबुआजी झा "अज्ञात"

एतबा धरि तॊँ करिहेँ सूगा
जतय जाँइ¸ जे करँइ¸ अपन छौ
सबल पाँखि उन्मुक्त गगन छौ
सुमधुर भाषा¸ प्रकॄति अहिंसक
अपन प्रदेश¸ अपन सभ जन छौ

मुदा कतहु रहि अर्जित जातिक
मान सुरक्षित रखिहेँ सूगा¸
एतबा धरि तॊं करिहेँ सूगा

उत्तम पद अधिकाधिक अर्थक
जाल पसारल छै कानन में
पिजड़ा बन्न प्रफुल्लित रहमे
राजा की रानिक आङन में

जन्म धरित्रिक मॊह मुदा तोँ

मन में सभ दिन रखिहेँ सूगा¸
एतबा धरि तॊँ करिहेँ सूगा । 

पराधिन छौ कॊन अपन सक
बजिहेँ सिखि-सि‌खि नव-नव भाषा
की क्षति¸ अपन कलाकय प्रस्तुत
पबिहेँ प्रमुदित दूध बतासा

मातॄ सुखक वरदान मुदा नहिं
पहिलुक बॊल बिसरिहेँ सूगा¸
एतबा धरि तॊँ करिहेँ सूगा ।

जननिक नेह स्वभूमिक ममता
रहतौ मॊन अपन यदि वाणी
देशक हैत उजागर आनन
रहत चिरन्तन तॊर पिहानी

मुदा पेट पर भऽर दै अनके
नहिं सभ बढ़ियाँ बुझिहेँ सूगा
एतबा धरि तॊँ करिहेँ सूगा ।


लाचार

कवि - श्री सुभाष चन्द्र

ओकरा बह्लेबक लेल

ओकरा लग अओर किछू नै छले

ओही दू गोट

घिन्चायल तिरआइल

हद स फाजिल चुसल

दू उरोजक सिवाय

जकराबेर बेरी ओ ठुंसी देत छल ओकर मुंह में

चाहे इच्छा व अनिच्छा

चाहे ऊ कनैत होई

रोटीक लेल

अथवा

कोनो खिलोनक लेल

आई फेर मोन उदास अछि …….

आई फेर मोन उदास अछि !
आँखि मे अतीत ,
आ जी मे प्यास अछि !
आई फेर मोन उदास अछि !!

दिवालीक दीया आ होरीक रंग !
लडिकपन के संगी, गामक हुरदंग !!
नुक्का-छिप्पी ओ झगड़ा-लड़ाई !
पोखरिक भीड़ पर पसरल अमराई !!
बहुरत कखन ओ दिन,
लगौने ई आस अछि !
आई फेर मोन उदास अछि !!

महुआ के मह-मह आ गमकैत आम !
अंगराई धरतीक नयनाभिराम !!
कोइली-पपीहरा गाबय मल्हार !
भौंराक गुंजन आ वसंती बयार !!
विरहक बैरी,
आएल मधुमास अछि !
आई फेर मोन उदास अछि !!
***
- करण समस्तीपुरी

सिंगरहार- श्री विवेकानन्द झा

- श्री विवेकानन्द झा
एक दिन अनचॊकहिं लिखऽ लागलहुं कविता
आ ई शताब्दीक अंतिम दशकक शुरुआती बर्ख छल
आ पुनः कतेकॊ बर्ख आंखिक सॊझां संऽ बीतैत गेल
एक दिन, एक दिन करैत
आ एक दिन
लागल कविता लिखबाक सामर्थ्य नहि रहल शेष
लागल हम प्रतिगामी आ खराप लॊक भऽ गेल छी
तें तऽ रूसि रहली कविता हमरा संऽ

Vivekanand Jha मधुबनी जिलान्तर्गत मधेपूर थाना अन्तर्गत तमौरिया स्टेशन लऽग’क बाथ नामक गाम’क निवासी श्री विवेकानन्द झा सम्प्रति नई दुनियाँ मे पत्रकार छथि. हिन्दी साहित्य’क अतिरिक्त हिनका मैथिली साहित्य मे विशेष रुचि छन्हि. प्रस्तुत कविता हुनक कतेक रास बात’क लेल दोसर रचना छिअन्हि



मुदा आब पुनः ओ सटल चलि आबि रहल अछि
तऽ लगै अय जे हम फेर संऽ नीक लॊक 
बनि रहल छी
हृदय हमर फेर भगवती घर केर निपलाहा धरती बनि रहल अछि

आ एखन इक्कीसवीं सदीक पहील दशक खत्म हॊअ लेल
अपन अंतिम बर्खक शुरुआत में जुटि गेल अछि
उमेद करैत छी अहि निपलाहा माटि पर 
खसतै पुनः कविताक सिंगरहार 
आ पुनः सुवासित हेतै ओकर, हमर, हमरा सबहक दुनिया|

एना किए ? - संतोष कुमार मिश्र

- श्री संतोष कुमार मिश्र
एकटा स्त्री,
हमर घरक सभटा काज क' दैअ
समय-समय पर आबिकs
हमर जरुरत पुरा क' दैअ
एहिके बाद ओ परतरि दैअ
मुदा एना किए?

Santosh Kumar Mishraकवि- श्री संतोष कुमार मिश्र। जनकपुर (नेपाल) निवासी श्री संतोष कुमार मिश्र जी काठमाण्डू (नेपाल) मे एकटा बहुराष्ट्रीय कम्पनी मे अधिकारी छथि। मैथिली साहित्य सँ विशेष लगाव आ मैथिली मे एखन धरि “पोसपूत" आ "उदास मोन” (कथा संग्रह), एना (आईना) (सम्पादित कविता संग्रह) प्रकाशित आ एखन एकटा कविता संग्रह "एना किए" प्रकाशनाधीन छन्हि। सम्पर्क- 00977-98510-11940 (मोबाइल)


जहिया हम असगरे रहै छी
तहिया ओ हमरा संग राति बित'बैय
कखनो तिल त' कखनो तार
कहियो राई के बनादै पहाड
कखनो हमरा लेल आँखि मे नोर
आ कखनो हमरा सँ दूर
मुदा एना किए?

की इएहे त' प्रेम नहि?
की इएहो प्रेम छै?
हमरा कोनो बेगरता होय
ओ सेहो पुरा क' दैअ
गलती जौं भ' गेल हमरा सँ
त' डटबो करैए
मुदा एना किए?

ओकर आँखि मे
एकटा भावना रहै छैक
ओकरा विश्वास रहै छैक हमरे पर
तैयो ओ हमरा डटैत रहैए
मुदा एना किए?

किछु जौं कहि दिअय त' 
भ' जाइए टोका-चाली बन्द
ओकर मुँह बन्द भइयोक '
ओकर आँखि
अपन प्रेमक गीत कहैए
मुदा एना किए?

किछु समय बाद
जेना किछु भेले नहि होय
जेना ओ हमरा सँ चिंतीते नहि हुयै
तहिना व्यवहार करैय
मुदा एना किए?

भाग्य !


पति के गप्प नहि मानि जतेक सुख करैत छथि !

भविष्यक लेल ओतबे दुखक पहाड़ बनाबैत छथि !!

कखन धरि रहि सकैत छथि ओ अपन नैहर मे,

बाप-भाय पर आश्रित भए क' !

एक न एक दिन हुनक आबय पड़तैन्ह,

सासुरक चौखट पर !

अन्तकाल मुखाग्नि सेहो सासुर पक्ष सौं भेंटतैन्ह !!

पति के तिरस्कार कए,

ओ कहियो नहि भ' सकैत छथि सुखी !

पायक बले किरायाक आदमी आनि सकैत छथि,

मुदा पति नहि !!

ओहन कमाई कमाई कि,

जाहि मे जिनगी गंवा दी !

लक्ष्मी त' चंचला छथि,

आई नहि त काल्हि अएबे करतीह !!

मुदा जिनगी के ई पल नहि घुरत !

यदि दू-चारि साल बाद घुरब,

तहनो बहुत किछु नहि भेंटत !!

पूरा जिनगी दरकि जाएत !

कतेक पढ़ल लिखल मुर्ख अछि ओ,

जे पति कें भाग्य कें त' कोसैत अछि,

मुदा अपनाक नहि !!


-- सुभाष चन्द्र झा

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लेखक: आदि यायावर मूलनाम: डा. कुमार पद्मनाभ पीयूस आफिस पहुँचि गेल छलाह. सबसँ पहिने अपन लैपटॉप खोलि फेसबुक में स्टेटस अपडेट केलाह आ ...