ई केहेन प्रेम (कहानी)

लेखक- डा० पद्मनाभ मिश्र
नई दिल्ली स्टेशन पर जखन सुमन जी अयलाह तऽ अपेक्षाकृत बेसी भीड़ छल. ओना तऽ वैशाली ट्रेन बिहार जेबाक लेल सबसँ महत्वपूर्ण ट्रेन होइत छैक मुदा आई आन दिन’क अपेक्षा आओर बेसी भीड़ छल. स्कूल कालेज मे गर्मी छुट्टी काल्हिए शुरु भऽ गेल छल. गर्मी छुट्टी सुमन जी’क लेल सेहो छलन्हि आ ओ अपन पैत्रिक स्थान जाइत छलाह. मुदा सुमन जी’क लेल कोनो बेसी परेशानी नहि छलन्हि. दू महीना पहिने ट्रेन रिजर्वेशन भऽ गेल छलन्हि. भीड़ सँ हुनका केवल ताबय धरि परेशानी छलन्हि जाबय धरि अपन कोच एस-६ मे बैसि नहि जाथि. राधिका से ओएह ट्रेन सँ जेबाक लेल टिकट लेने छलीह आ बाद मे वरुण’क प्रोग्रम से बनि गेलन्हि. क्रमशः तीनो लोकनि मिलि अपन अपन गाम जेबाक लेल एस-६ मे बैसि गेल छलैथि.

Dr. Padmanabh Mishra
लेखक- डा० पद्मनाभ मिश्र, बनैनियाँ सुपौल शिक्षा- बी.टेक, एम. टेक. पी०एच०डी. ईलेक्ट्रनिक्स इन्जिनीरिँग मे, अभिरुचि: मैथिली साहित्य




ओना तऽ प्रत्येक गर्मी छुट्टी मे सुमन जी गाम जाइत छलाह. किओ पुछन्हि तऽ ई नहि कहैथ जे गाम जा रहल छथि. ओ इहो नहि कहैथ जे अपन बुढ़ दादा-दादी सँ भेँट करबाक लेल जाइत छथि. अपितु हुनका ई कहबा मे नीक लागन्हि जे ओ आम खेबाक लेल गाम जा रहल छथि. जाबय धरि पटना मे छलाह ताबय धरि प्रत्येक मास गाम पहुँचि जाथि मे दिल्ली तँ दिल्ली छल. साल मे एक्के बेर गाम जाइत छलाह. इएह प्रत्येक गर्मी’क छुट्टी मे. कोसी कात मे बसल हुनकर गाम मे गर्मी कम से लागन्हि आ आम खेबाक मौका अलग सँ. दुनियाँ दोसर भाग मे आम’क महत्व शायदे एत्तेक भऽ सकैत अछि. देश प्रदेश सँ लोक केवल आम खेबाक लेल गाम जाति छथि. केवल एतबे नहि किछु लोक तऽ एहेन होइत छथि जे जाइत छथि कोनो काज सँ आ नाम आम’क लगा दैत छथि. नवकनियाँ केँ नैहर एहि लेल जेबाक छन्हि जे हुनका आम खेबाक छन्हि. धिया पुता अपन मामा गाम एहि लेल जेताह जे हुनका आम खेबाक छन्हि. नवकनियाँ सासूर’क जिम्मेदारी वा अपन माँ बाबूजी सँ भेँट करय नहि जेतीह, धिया-पूता लोकनि पढ़ाई लिखाई छोड़ि मामा गाम मे मस्ती करय नहि जेताह ओ सब लोकनि आम खेबाक लेल जेताह. जे नवकनियाँ आम’क समय मे नैहर नहि जा सकलीह हुनकर सासूर’क लोक उलहन दऽ दैत छन्हि, "हिनका माए बाप केँ आमक गाछ अछि ? जे आम खेबाक लेल जेतीह?". कोनो वर के विवाह सँ पहिने आम’क गाछ एक कसौटी होइत अछि. मतलब ई जे अमूक वर केँ एत्तेक कलमी आम छैक आ एत्तेक बीजू. कुल मिलाँ केँ प्रत्येक लोकक अपन अपन स्वार्थ मुदा बीसाइत आम’क सिर पर. नहि जानि आम खेबा’क बहाना सँ कतेक स्वार्थ’क पूर्ती भेल अछि. आम’क सिर बिसाबैत ओ हजारोँ स्वार्थी लोक मे सुमन जी एकटा अभिन्न आदमी छलाह जे अपन स्वार्थ’क पूर्ती’क हेतु आमक सिर बिसेलैथि.

ट्रेन अपन वेग सँ जा रहल छल. सुमन जी घर सँ खाना आनने नहि छलैथ तेँ ट्रेन’क पेन्ट्री पर आशा छलन्हि. ट्रेन’क खाना हुनका अपेक्षाकृत बेसी नीक लागैत छलन्हि तेँ चिकेन पराठा आर्डर कए देलथिन्ह. राधिका आ वरुण अपन आदत अनुसार दालि भात तरकारी खेलथिन्ह. राधिका तऽ बढ़िये सँ खाना खेलीह मुदा वरुण केँ नहि तऽ दालि भात तरकारी वा नहिएँ चिकेन परोठा मे कोनो विशेष रुचि छलन्हि. राधिका हुनका खाना खेबाक क्रम मे काएक बेर टोकल्कन्हि मुदा हुनका उपर मे कोनो विशेष फर्क नहि पड़लन्हि. हमेशा’क तरह वरुण अनठेने छलैथ. राधिका’क आग्रह हुनकर अपन जिद्द के सोझाँ मे नहि चलि सकल. अन्त मे राधिका तमसा के कहने छलथिन्ह, "रात को भूख लगेगी तो कुछ नही मिलेगा". वरुण तैयो स्तब्ध छलैथि. आ हुनकर बाडी लैन्गूएज एहेन कहैत छल जे ओ खेबा पीबा मे बहुत शौकीन किस्म के लोक छथि आ ट्रेन’क ई गन्दा खाना मे हुनका कोनो अभिरुचि नहि छन्हि. मुदा राधिका बाडी लैन्गूएज एहेन कहैत छल जे नहि खायब तऽ पछताएब. सुमन जी केँ होइत छलन्हि जे राधिका बिना मतलब के वरुण’क आव भगत करैत छथि. जिनका भूख लागतन्हि ओ अपने खेताह ओहि मे राधिका के जिद्द सँ कोन फायदा?. मुदा ओ एहि मे राधिका के कोनो गलती नहि दैत छलाह. हुनका लागैत छलन्हि जे वरुणे नाटक कऽ रहल छथि. आ राधिका स्त्री जाति होयबाक कारणे सबहक चिन्ता अपने उपर नेने छलीह.

सुमन जी केँ पिछला समय याद आबय लागलन्हि. राधिका हुनका सँ कतेक प्रेम करैत छलीह. ओना तऽ आई काल्हुक समय मे कोनो दोसर आदमी केँ फुर्सते नहि भेटैत छन्हि. मुदा कनियोँ फुर्सत भेला पर राधिका हुनकर कतेक ख्याल राखैत छलीह. मुदा जहिया सँ वरुण राधिका’क जीवन मे प्रवेश कयलन्हि सब किछु बदलि गेल. राधिका’क वरुण सँ नजदीकी सुमन जी केँ फुटलो आँखि नेहि सोहाइत छलन्हि. कएक बेर सुमन राधिका सँ पुछि चुकल छलाह जे की ओ हुनका सचमूच के प्रेम करैत छथि. आ प्रत्येक बेर राधिका हुनका उत्तर दऽ देने छलीह, जे ओ एखनो सिर्फ सुमने जी टा सँ प्रेम करैत छथि. सुमन जी राधिका सँ कएक बेर पुछि चुकल छलाह जे हुनका कोनो प्रोब्लेम नहि हेतन्हि, ई जानि के जे ओ आब हुनका सँ नहि बल्कि केवल वरुण सँ प्रेम करैत छथि. मुदा प्रत्येक बेर राधिका’क इएह जवाब छलन्हि जे किछुए दिनक बात अछि ओ वरुण सँ दूर भऽ जेतीह. राधिका’क ई बीच वाला खेल सुमन जी केँ बिल्कूल नहि पसन्द आबि रहल छलन्हि. आ नहि जानि राधिका वरुण मे कोन एहेन चीज देखैत छलीह जे सुमन जी सँ दूरी बना लेने छलीह. मुदा कोनो दोसर फैसला लेबय सँ पहिने ओ देखय चाहैत छलाह जे राधिका’क झूठ’क सीमा की अछि?. राधिका केँ ओ पूरा टाइम देबय चाहैत छलाह जे बात मे हुनका कोनो अफसोस नहि रहि जान्हि. ओ राधिका’क "किछुए दिन" केँ देखय चाहैत छलैथ जे ओ दिन आयत जहिया ओ वरुण सँ बहुत दूर भऽ जेतीह. वा पूर्ण रुप सँ आस्वस्थ होमय चाहैत छलाह जे एहेन दिन कहियो एबो करत वा नहि. हुनका मोन मे एक सय बात चलैत छलन्हि मुदा ओ किछु बाजलाह नहि.
अमावाश्याक अन्हरिया राति मे ट्रेन खटर खटर के आवाज करैत तीव्र वेग सँ जा रहल छल. ट्रेन वेग मे कखनो एक दिस झुकि जाइत छल तऽ कखनो दोसर दिस. पटरी जोड़ पर कखनो जोर सँ आवाज होइत छल तऽ कखनो सर्रर.. सँ निकलि जाइत छल. बाहर सँ आबैत टटका हवा सँ गर्मी’क बिल्कूल अनुभव नहि होइत छलन्हि. कखनो दूर कोनो गाम मे बिना बिजली’क खपरैल घर मे जरैत लाल्टेन पर सुमन जी’क ध्यान चलि जाइत छलन्हि. कखनो खिड़की सँ कोनो भगजोगनी कम्पार्टमेन्ट मे घुसि जाइत छल अ कनि देर इम्हर उम्हर केलाक बाद फेर सँ बाहर चलि जाति छल. कखनो छोटका सन स्टेशन पर कोनो छोटका सन स्टेशन मास्टर बड़का सन ग्रीन लाइट के देखबैत छलाह आ जाबय धरि सुमन जी एहि दृश्य केँ नीक जेकाँ देखतथि ताबय धरि ओ स्टेशन बहुत पाछू छुटि जाइत छल. चलैत ट्रेन सँ श्टेशन के देखनाई सुमन जी केँ बच्चे सँ नीक लागैत छलन्हि. विशेष रुप सँ श्टेशन मास्टर’क ग्रीन लाइट.
बाहर देखैत देखैत ओ मूल बात केँ बिसरि जाति छलाह. मुदा जखने वरुण दिस ध्यान जाइत छलन्हि मोन फेर सँ तामसेँ घोर भऽ जाइत छलन्हि. वरुण हिनका दिस टटकी लगा केँ देखैत छलाह मुदा तामसेँ सुमन जी हुनका दिस देखतो नहि छलाह. कखनो कखनो राधिका हिनका दिस देखैत छलीह तऽ सामान्य सन मुस्की इहो दऽ दैत छलाह. ओ कोनो भी कीमत पर राधिका’क मोन नहि दुखबे चाहैत छलाह. मोन मे एत्तेक उपराग भेलाक बादो राधिका’क केँ आभाष होमय नहि देबय चाहैत छलाह जे हुनकर हृदय’क स्थिति की छन्हि. तेँ नहिँ चाहितोँ हुनका मुँह पर मुस्की आबि जाइत छलन्हि. राधिका’क मुँहपर सुमनजी’क मुस्की सँ सँतुष्टि’क भाव आबैत छलन्हि. प्रतिपल सुमन जी केँ ओ सन्तुष्टि बेमानी लागैत छलन्हि, मुदा अन्हरिया राति मे कोनो दोसर उपायो नहि छलन्हि.

गाड़ी ओहिना अपन वेग सँ जा रहल छल. बाँकी यात्री मे हँसी ठहाका होइत छल, मुदा राधिका, वरुण आ सुमन जी स्तब्ध छलैथि. खिड़की लग मे राधिका बैसल छलीह आ हुनकर बगल मे वरुण आ गैलरी’क दोसर दिस साइड वाला नीचला बर्थ पर सुमनजी असगरे बैसल छलाह. सुमनजी’क ध्यान अन्हार राति मे खिड़की लग बैसल राधिका’क दिस जखन गेलन्हि तऽ राधिका’क पैघ पैघ आँखि बिजुली सन चमैक जाइत छलन्हि. गौर वर्ण, चाकर चेहरा आ अनन्त दिस ताकैत पैघ पैघ आँखि. शैम्पू काएल केश हुनकर गाल पर आबि जैत छलन्हि मुदा किछुए देर मे मई महीना’क बयार फेर सँ आबि केँ वापस लऽ जाइत छलन्हि. आँखि मे कोनो भाव नहि छलन्हि. बिल्कूल निरीह आ नीरव. मुदा सुमन जी केँ ओ दृश्य बढ़ियाँ लागैत छलन्हि. बिल्कूल कञ्चन, कमनीय, कल्पना लोक मे विचरण करए वाला.

राधिका केँ बाँकी सहयात्री सँ कोनो बातचीत नहि भऽ रहल छल. राधिका देखबा मे बहुत सुन्दर आ नवयूवती छलीह आ बाँकी सहयात्री मे कोनो दोसर स्त्री नहि छल. बाँकी लोक कोनो सुन्दर यूवती सँ फराके रहला मे बुद्धिमानी बुझैत छलथिन्ह. सुन्दर यूवती सँ बात केला सँ नहि जानि दोसर लोक की बुझत. राधिका पढ़ल लिखल छलीह आ ओएह कम्पार्टमेन्ट मे बाँकी लोक कोन कोन मसला पर बात करैत छलाह मुदा राधिका ओहि मे हिस्सा नहि लैत छलीह. तेँ दोसर ग्रूप सँ हिनका लोकनि के कोनो बातचीत नहि भऽ रहल छलन्हि. नहि जानि बाँकी लोक की बुझत. तेँ एखनि धरि बाँकी लोकनि हिनका तीनो लोकनि सँ कोनो बातचीत नहि केने रहैथि. शायद सुमन जी केँ सेहो नीके लागैत छलन्हि. ओ खुदे नहि चाहैत छलाह जे कोनो आन लोक राधिका सँ बात करय. तेँ ओहि कम्पार्ट्मेन्ट के बाँकी लोक हिनका तीनो लोकनि केँ फुटा देने छलन्हि. ई ओएह राधिका छथि जे अपन कालेज मे कोनो भी वाद विवाद प्रतियोगिता केँ छोडैत नहि छलथीन्ह बल्कि ओहि मे अव्वल रहैत छलीह. मुदा नहि जानि किएक एखन रियल टाइम डिसकशन मे हिस्सा किएक नहि लऽ रहल छलीह. राधिका अपन जीवन’क बेसी समय दिल्ली मे बिताओने छलीह. हमेशा सँ स्त्री पुरुष के बराबरी के अधिकार’क वकालत करैत एलीह मुदा एहेन मौका पर हुनका की भऽ जाइत छन्हि से नहि जानि. स्त्री पुरुष के बराबरी के अधिकार वाला यूरोपीयन बात मे नहि जानि कोना भारतीय स्त्री’क मूल्य समाहित होइत छल. बात एतबी टा नहि छल. हिनका तीनो लोकनि मे सेहो बातचीत नहि भऽ रहल छलन्हि. शायद तीनो लोकनि मे तीनो लोकनि एत्तेक नजदीक भेलाक बावजूदो एहेन लागैत छल जे कोनो जान पहचान नहि छलन्हि. कखनो कखनो अपन मूल्य आ अपना आप केँ चिन्हबाक लेल शाँति’क जरूरत होइत अछि. भीड़ मे बजला सँ लोक अपना आप के बिसरि जाइत छथि. शाँति भेटला पर आ चुप रहला पर लोक अपना आप सँ बात करैत अछि आ इएह काज ई तीनो लोकनि सेहो करैत छलथिन्ह.

ट्रेन तीव्र गति सँ अन्हरिया केँ चीरैत भागि रहल छल. हिनका तीनो लोकनि केँ ध्यान तखने भँग भेलन्हि जखन हिनकर ध्यान ट्रेन’क बाँकी सहयात्री भँग केलथिन्ह. हिनका लोकनि केँ एक सज्जन पुछल्थिन्ह, "अब रात ज्यादा हो गई है अब बिस्तर लगा लेते हैँ". तीनो लोक एक्के सँग स्वीकृति दऽ देलथिन्ह.

चादर बिछा केँ सुमन जी सेहो सुति रहल छलाह. राधिका हुनका बीच वाला बर्थ पर सुतय लेल कहल्थिन्ह आ राधिका खुद साइड मे नीचा वाला बर्थ पर सुति रहलीह. मुदा हुनका नीन्द नहि आबैत छलन्हि. अपन ध्यान अपन सहपाठी दिस लगेबाक प्रयास करैत छलथिन्ह मुदा बारम्बार ध्यान वरुण’क गतिविधि पर टिक जाइति छलन्हि. जहिया सँ वरुण राधिका’के जिन्दगी मे आयल तहिया सँ हुनकर दुनियेँ बदलि गेलन्हि. नहि जानि राधिका वरुण मे कोन एहेन चीज देखैत छलीह जे सुमन जी सँ दूरी बना लेने छलीह. फुसियोँ के आँखि मुनि केँ सुमन जी अपना आप के बहलेबाक प्रयास करैत छलाह जे नीन्द आबि जान्हि मुदा एना सम्भव नहि भेलन्हि. कम्पार्टमेन्ट मे एक बुजूर्ग सहयात्री जोर सँ फोँफ काटैत छलाह जाहि सँ हिनकर सुतबाक प्रयास हरदम असफल भऽ जान्हि. एक बेर हुनकर सुतबाक प्रयास सफल भेले छलन्हि कि ओएह बोगी मे दूर मे कोनो बच्चा कानि उठल. ओ फेर सँ उठि गेलाह.

आब ओ सोचि नेने छलाह जे ओ सुतबका प्रयास नहि करताह. ओ केहुनी भरेँ कनपट्टी केँ हाथ पर टिका केँ ओ अन्हरिया राति मे आँखि खोलि के खिड़की’क बाहर देखबाक प्रयास करैत छलाह. बारम्बार करऽट लैत छलाह. अन्हरिया राति मे ओएह अनन्त दिस ताकैत छलाह. बीचला बर्थ पर सुतल रहला सँ पँखा’क गरम हवा टा लागन्हि मुदा रहि रहि केँ बाहर’क बयार आबि जान्हि आ हिनकर अनन्त दिस ताकनाई सफल भऽ जान्हि. इएह क्रम मे नहिँ जानि कखन हिनकर आँखि लागि गेलन्हि.

सुमन जी सुतल रहलाह. कतेको स्टेशन पर गाड़ी रुकल, कतेक छोटका स्टेशन पर छोटका सन स्टेशन मास्टर बड़का सन ग्रीन लाइट देखबैत पाछू छुटि गेलाह. कतेक बेर बाहर’क बयार हिनका छुबि केँ चलि गेलन्हि. कतेक बेर राधिका उकासी केलीह. कतेक जोर सँ बुजूर्ग सहयात्री फोँफ काटैत रहि गेलाह मुदा ओ सुतल रहलाह. हुनकर नीन्द तखने खुजलन्हि जखन वरुण’क आवाज कान मे सुनाई पड़लन्हि. वरुण राधिका सँ कहि रहल छलाह जे हुनका जोर सँ भूख लागल छन्हि. सुमन जी के बुझल छलन्हि जे ई वरुणमा राति मे नाटक जरूर करत. साँझ मे हुनका कतेक कहल गेल छलन्हि जे खा लिअ मुदा ओ किनको नहि सुनलाह. सुमन जी किछु नहि बजलाह.

सुमन जी केँ होइत छलन्हि जे राधिका राति के अनठा देतीह. ओ वरुण केँ छोड़ि देतीह. ओ बहाना मारतीह जे भोर मे किछु जलखई कऽ लेब. मुदा जे देखलैथि ओ हुनका अधनीना सँ पूर्ण जगा देलकन्हि. राधिका उठि चुकल छलीह. वरुण हुनकर लऽग मे बैसल छलाह. राधिका बिना लाइट जलौने बैग मे किछु ताकि रहल छलीह. हुनका लोकनि केँ होइत छलन्हि जे सुमन जी सुतले छलाह. मुदा ओ तऽरे आँखि सब किछु देखि रहल छलैथ. राधिका स्टील’क एकटा टिफिन निकालैथि. ओहि टिफिन मे किछु खेबाक लेल सामिग्री छल. वरुण पड़ि रहलाह. राधिका हुनका चम्मच सँ खुआ रहल छलीह. वरुण’क मुड़ी राधिका’क कोरा मे छलन्हि. एखन वरुण एक्को बेर नहि मना करैत छलाह जे हुनका नीक नहि लागैत छन्हि. गटागट सब किछु अन्दर केने जा रहल छलाह.
अन्हरिया राति केँ चीरैत ट्रेन तीव्र वेग सँ जा रहल छल. बीच वाला बर्थ पर अनठेने सुमन जी सब किछु देखि रहल छलाह. हुनका राधिका’क उपर मे कोनो विश्वास नहि रहि गेल छलन्हि. राधिका’क बात’क कोनो मोल नहि. राधिका अपन घर सँ वरुण’क खेबाक लेल बना के आनने छलीह. ई बात हुनका सँ नुकौने किएक छलीह. राधिका केँ जँ वरुण एत्तेक प्रिय लागैत छलन्हि तऽ ओ एक्के बेर मे मानि किएक नहि लैत छलीह. किएक हुनका आश्वासन पर आश्वासन दैत छलीह. हुनकर ध्यान फेर सँ ओहि दुनू लोकनिक दिस गेलन्हि. राधिका चम्मच लऽ केँ वरुण’क खाना वरुण’क मुँह मे देने जा रहल छलीह. एखनो धरि वरुण’क माथ राधिका’क कोरे मे छलन्हि. राधिका रहि रहि केँ सुमन जी’क दिस टोहि लऽ लैथि जे कहीँ हो न हो ओ जागल हेताह. मुदा सुमन जी एना अनठेने छलाह जे राधिका पूर्ण आस्वस्थ छलीह जे सुमन जी सुतले छथि. मुदा तऽरे आँखे सुमन जी सब किछु देखि रहल छलाह. ओ देखलैथ जे राधिका’क खुलल शैम्पू काएल केश वरूण’क माथ पर आबैत छलन्हि. वरुण केश’क ओहि लट केँ अपन कँगूरिया आँगूर मे गोल गोल फँसबैत छलाह आ ओकर बात नहुँए नहुँए खीचैत केश केँ खोलि दैत छलाह. एना केला पर राधिका हुनका अगिला चम्मच खाना देबा सँ पहिने मुस्किया दैत छलीह. राधिका केँ वरुण’क नौटँकी पर कोनो एतराज नहि छलन्हि.

मानवीय सम्बन्ध’क तेसर पहलू, यदि पाठक लोकनि’क भावना ई कहानी उठा-पटक’क सँग आ हमर कल्पना’क उड़ान सँग उड़ान भरने होमय तऽ टिप्पणी द्वारा सूचित करी. पाठक लोकनिक टिप्पणी हमर कल्पना’क उड़ान केँ आओर ऊँचाई देत, हमर इएह सोचब अछि. टिप्पणी जरूर दी




आब सुमन जी सँ बर्दाश्त नहि भऽ रहल छलन्हि. हुनकर कोँढ़ फाटय लागलन्हि. ओ सोचय लागलाह, वरुणक राधिका’क जीवन मे एला सँ पहिने हुनकर जीवन कतेक बढ़ियाँ छल. राधिका एहिना हुनका लेल स्पेशल खाना बना केँ आनैत छलीह आ सुता केँ अपन कोरा मे हुनकर माथ लऽ के चम्मच सँ खुआबैत छलीह. तऽरे तऽर हुनका मुँह सँ आवाज निकललन्हि, "ई वरुणमा जे नऽ करय". मोन मे बहुत तामस उठि रहल छलन्हि. मोन मे होइत छलन्हि जे चीकरि केँ राधिका केँ पुछैथ जे इएह थीक अहाँक आश्वासन. इएह थीक अहाँक सप्पत. मोन होइत छलन्हि जे जा केँ वरुण’क गाल पर जोर सँ एक चाँटा मारैथ आ भगा दैथि हुनका. फेर होइत छलन्हि ई अन्हरिया राति मे चलैत ट्रेन मे कोनो सीन क्रिएट करय सँ बढ़ियाँ अछि जे सब हिसाब भोरे सुति केँ लेल जाए.
फेर कखनो मोन मे होइत छलन्हि जे राधिका केँ लऽग मे जाकेँ कहैथ, "अहाँ हमरा बुरबक बुझैत छी?, बहुत दुनियाँ हमहुँ देखने छी, अहाँ हमरा सँ नुका केँ वरुण’क लेल अलग सँ खाना बना के आनने छी, कोरा मे सुता के हुनका खुआ रहल छिअन्हि तकर मतलब हमरा नहि बुझल अछि?".


एहि कथा’क बाँकी हिस्सा हमर पोथी "भोथर पेन्सिल सँ लिखल" मे देल गेल अछि. पोथी’क बारे मे विशेष जानकारी आ कीनबाक लेल प्रक्रिया निम्न लिन्क मे देल गेल अछि. http://www.bhothar-pencil.co.cc/ .
मैथिली भाषा’क उत्थान मे योगदान करु. पोथी कीनि साहित्य केँ आगू बढ़ाऊ.

केकर दोष- राजेश रंजन झा

चेहराक चमक लागय सुखायल,
मुँह लागय छन्हि बिधुयायल,
आँखि जेना रहन्हि ऊँघायल,
दिस ताकि रहल दूबि पडक ओस,
मुदा एहि में बेटी के कोन दोष,

राति संगी के विवाह देखय गेलीह,
गीत-नाद गेने छलीह,
भोरे मुँह लटकौने एलीह,
मोन विवाहक लेल छल निभरोस,
मुदा एहि में बेटी के कोन दोष,

Rajesh Ranjan Jhaकवि- श्री राजेश रंजन झा, जन्म- 31 जनवरी, 1980। पिता- श्री सुनील कुमार झा, ग्राम- महतबार, पोस्ट- घनश्यामपुर, जिला-दडिभंगा (बिहार)। वर्ष 2001 में ल. ना. मि. विश्वविद्यालय, दडिभंगा सँ भौतिकी विज्ञान में स्नातक। लेखनक शौक बच्चे सँ, हुनक इ पहिल प्रकाशित रचना। सम्प्रति I.T.C. में Logistic Executive के पद पर कार्यरत। सम्पर्क- +91-9818554046 (नई दिल्ली)



बाबूजीक हाथ पर टाका नहि छन्हि,
पैंचो-उधार केओ नहि दन्हि,
बेचबाक लेल जमीनो नहि रहन्हि,
बन्द चारु कात सs मुद्राक कोष,
मुदा एहि में बेटी के कोन दोष,

बेटा के बाप छिट्टा सन मुँह केने,
लाख टका आ ग़ाडी के जिद्द धेने,
एकहि बात के रट्ट लगेने,
कनिया चाही पढल फर्रोश,
मुदा एहि में बेटी के कोन दोष,

आब आगाँ लागय अन्हार जेकाँ,
अपनो लोक अनचिन्हार जेकाँ,
इ जिनगी लागय पहाड जेकाँ,
ताना मारय छय टोल पडोस,
मुदा एहि में बेटी के कोन दोष,

दहेज प्रथा जौं ने जायत हटायल,
गरीब जेता एहिना उजाडल,
बेटी सभ जायत जरायल,
तखन अहीं कहबै अछि अफसोस,
मुदा एहि में बेटी के कोन दोष?

आयल सावन- कुन्दन कुमार मल्लिक

(सावनक पहिल फुहार केँ समर्पित हमर इ नव प्रस्तुति)

गरजि रहल मेघ,
बाजय टर-टर बेंग,
दामिनी रहि-रहि दमकय,
दादुर, झिंगुर संगहि बाजय,
सब मिलि के बाजि रहल अछि,
आयल-आयल सावन,
लागय बड मनभावन,
खेत-पथार हरियायल,
गर्मी भागि परायल,
पोखरि-डबरा सभ भरि गेल,
पोठी-टेंगरा सहज भs गेल,
बहादुर भैया बरद हाँकलथि,
रोपनी आब शुरु भs गेल,
निहुर-निहुर रोपय बहिना,
रमखेतारी बाली गीत उठौलक,
आयल-आयल सावन,
लागय बड मनभावन,
सखी-बहिनपा झूला झूलथि,
कजरी-मल्हार सँगहि गाबथि,
सभहक हाथ मेँहदी लागल,

प्रियंका भौजी घोघ उठाओल,
हुनक जे मधुश्रावणी आयल,

रंग-बिरंगी बतगबनी गायल,
सखी-सहेली फूल लोढय चललथि,
खेलथि झूमरि, सभ मिलि गाबथि,
आयल-आयल सावन,
लागय बड मनभावन।

(विशेष सुधार आ अंतिम पैरा श्री राजेश रंजन झा, नई दिल्ली, मो.- +९१-९८१८५५४०४६ द्वारा लिखल गेल। राजेश जी केँ धन्यवाद।)

- कुन्दन कुमार मल्लिक, सम्पादक, "कतेक रास बात",
सम्पर्क- +९१-९७३९००४९७० (बेंगलुरु)

ग़जल- गलती (सुभाष चन्द्र)

गलती

हम ओकरा देखि नहिं सकल,
नहिं जानि केहेन चेहरा छल,
दर्दक चिडय जेखन आयल,
चारुकात अन्हरिया छल,
हम जेखन मुस्कियैत छलहुँ,
आँखि सँ बुन टपकैत छल,
हमर किस्मत पर दुर्दिन’क छाया छल,
इ तs हमर गलती छल,
परछाई पर भरोसा कएल,
परछाई के कोन दोख,
ओ तs शब्दविहीन छल,
डिबिया’क टेमी नागिन जेकाँ,
अन्हार देबाल पर बुझैत छल,
एकसरि में बीन सँ बेसी सुनसान’क घोर छल,
जेकर नाव टकरायल राति भरि तूफान सs,
ओहि बेचारा के देह कछेर पर ठहरल छल!!
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सजा

यदि नहिं दैतहुँ सजा हमरा,
त उमर भरि रहि जायत टीस हमरा,
सबहक नजरि रहत हमरे दिस,
एना नहिं धीरे स बजाउ हमरा,
की बतबैत अछि इ लकीर सभ,
मुठ्ठी खोलि के देखू एकरा,
टिमटिमैत भोरक तरेगन,
दs रहल अछि आस हमरा,
हमरा जैबाक नहिं अछि मंजिल पर,
कियैक शोर पाडैत अछि रस्ता हमरा,
हम सितमगर, फरेबी, झूठा छी,
की की नहिं कहलक ओ हमरा,
हमरा बिर्रो बनि के जाय दिअ,
कियो शोर पारि रहल अछि हमरा।

- सुभाष चन्द्र, नई दिल्ली, सम्पर्क:- +91-98718 46705, ई-मेल- subhashinmedia@gmail.com

कतेक रास बात सम्बन्धित नियम, कानून आओर शर्त

कतेक रास बात के सुचारू चलेबाक हेतु आ एवम एकरा प्रोमोट करबाक हेतु निम्नलिखित शर्त, नियम एवम कानून तय गेल अछि. ई नियम एवम कानून १५ अगस्त सँ लागू होयत. अपने लोकनि सँ आग्रह जे एहि नियम एवम कानून मे कोनो बदलाव’क सुझाव दी. एहि तरहक नियम कानून सबहक उपर मे लागू होयत (हमरो उपर मे). ई नियम एवम कानून सम्पादक, लेखक पाठक एवम टिप्पणीकर्ता केँ लेल एकटा दिशा निर्देश सेहो अछि. पाठक लोकनि सँ आग्रह जे प्रत्येक नियम केँ पढल जाए आओर ओहि मे कोनो सम्भावित फेर बदल करबाक हेतु अथवा कोनो नव नियम जोड़बाक हेतु टिप्पणी सँ सूचना देल जाए.

उद्देश्य:
१. कतेक रास बात एकटा एहेन मँच अछि जे गैर पेशेवर मैथिली लेखक केँ अपन रचना इन्टरनेट पर प्रकाशित करवाक अवसर प्रदान करैत अछि. कतेक रास बात’क मुख्य उद्देश्य इन्टरनेट पर मैथिली’क प्रचार प्रसार करबाक अछि.

कापीराइट सूचना:
२. कतेक रास बात पर प्रकाशित प्रत्येक रचना कापीराइटेड अछि. एकरा कोनो भी रूप मे कोनो दोसर जगह प्रकाशित करब एकटा अपराध अछि. एहेन कोनो तरह’क सूचना भेटला पर (१) पहिल तीन दिन’क भीतर सम्बन्धित लोकनि केँ नोटिस भेजल जायत (२) कोनो कारवाई नहि भेला पर अगिला ७ दिन’क भीतर मे कतेक रास बात पर एहेन तरह’क चोरी’क सूचना देल जाएत आ मैथिली ग्रूप मे प्रकाशित काएल जाएत. (३) एहिला दू सप्ताह के भीतर मे कोनो कारर्वाई नहि भेला पर Intelectual Property Right आओर Copyright Infringement के आधार पर कम सँ कम प्रति रचना एक लाख रुपैया’क हर्जाना’क माँग हेतु मुकदमा दायर कायल जायत.

शुरुआतकर्ता:
३. कतेक रास बात’क शुरुआत डा० पद्मनाभ मिश्र (आदि यायावर) द्वारा कायल गेल अछि.

सँयोजक एवम सँचालक:
४. कतेक रास बात’क मुख्य सँयोजक एवम सँचालक डा० पद्मनाभ मिश्र एवम श्री राजीव रँजन लाल अछि. कोनो भी विवाद भेला पर एहि दुनू वा किओ एक लोकनिक निर्णय अन्तिम एवम सर्वमान होयत.
५. कोनो भी सम्पादक’क कार्य देखलाक बाद आ दुनू सँयोजक के निर्णय केर आधार पर ओहि सम्पादक केँ सँयोजक आ सँचालक मण्डली मे शामिल कायल जा सकैत अछि. वर्तमान सँयोजक एवम सँचालक’क निर्णय अन्तिम.

सम्पादक मण्डली:
६. वर्तमान मे कतेक रास बात मे चारि सम्पादक अछि. सम्पादक’क निम्न कार्य निर्धारित काएल गेल अछि.
७. कोनो रचना के प्रकाशित करबाक अथवा नहि करबाक अधिकार पूर्ण रूप सँ सम्पादक के अछि. वर्तमान मे चारि लोकनि सम्पादक मण्डली मे छथि:
a. डा० पद्मनाभ मिश्र
b. राजीव रँजन लाल
c. कुन्दन कुमार मल्लिक
d. केशव करण
८. सम्पादक लोकनि कतेक रास बात पर मुख्य योगदान कर्ता सेहो रहताह.
९. भविष्य मे कोनो भी पुरस्कार सँबँधित निर्णय पूर्णतः सम्पादक लोकनि के हाथ मे रहत.
१०. सम्पादक मण्डली मे बहुमत के अधार पर रचना पर विचार काएल जायत. यदि कोनो निर्णय मे बराबर के मत अछि तऽ सँयोजक’क निर्णय अन्तिम मानल जायत.
११. सम्पादक मण्डली’क सुझाव पर कम सँ कम दस रचना कतेक रास बात मे प्रकाशित केला पर कोनो भी लेखक केँ सम्पादक मण्डली मे शामिल काएल जा सकैत अछि.
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एक पिता'क विलाप- कुन्दन कुमार मल्लिक


ढहल भीत, उजडल चार,
ताहि तर एकगोट वृद्ध ठाढ,
टूटल चश्मा, पथरायल आँखि,
निहारि रहल छथि रस्ता,
बाट तकैत अपन लाल सभ केँ,
जे छथि दूर कतओ कोनो शहर में,
मस्त अपन-अपन दुनिया में,
भुतियायल शहर’क चकाचौन्ध में,
छोडि अपन वृद्ध माय-बाप केँ,
एहि दीन-हीन हाल में,
आई छथि ओ मुँह ताकैत,
एकगोट रोटी’क टुकडा’क लेल,
ओहि वृद्ध’क आत्मा विलाप छन्हि कय रहल,
आई छथि ओ सोचि रहल,
ओs पोसलथि कोना के,
अपन चारि गोट धिया-पूता केँ,
अपन एक कोठलीक भीतक घर में,
आई छथि ओ प्रश्न कय रहल,
की हुनक चारि गोट पुत्र’क चारि टा मकान में,
छन्हि हुनका लेल एक्को टा कोना नहि?

नोट- पेशा सँ मेडिकल रिप्रेजेंटेटीव छी, दिन भरि अस्पताल आ डॉक्टर सभहक क्लिनिक'क चक्कर लगबैत रहैत छी। एहि क्रम में कतेको लोक सभ सँ जान-पहचान होयत रहैत अछि। गप्प'क क्रम में नव-नव अनुभव आ नव-नव बात सिखय के भेटैत अछि। किछु दिन पहिने बंगलोर'क एकटा अस्पताल में बैसल रही। बगल में बैसल एकगोट वृद्ध सँ गप्प कय रहल छलहुँ। हुनक डबडबायल आँखि आ जीर्ण-शीर्ण काया देखि के मोन द्रवित भs गेल। इ कविता ओहि वृद्ध सँ भेल वार्त्तालाप पर आधारित अछि। पाठक लोकनि सँ आग्रह जे एकरा मात्र एकटा पद्य नहिं बुझी। इ एकटा यक्ष प्रश्न अछि जे जाहि माता-पिता अपन धिया-पूता के पालि-पोसि के पैघ करय छथि आ एकदिन वैह धिया-पूता हुनक सुधि नहिं लय छन्हि। वृद्धाश्रम के की प्रयोजन? यदि हमर इ रचना कोनो एहन लोकनि केँ सोचय के लेल बाध्य करतन्हि तs हम अपन प्रयोजन सफल बुझब।
- क़ुन्दन कुमार मल्लिक

ग्राम- बलियारी, डाक- झंझारपुर,
जिला- मधुबनी (बिहार)- ८४७४०४,
ई-मेल- kkmallick@gmail.com
सम्पर्क-+९१-९७३९००४९७० (बंगलोर)

जलकुम्भी, (धारावाहिक उपन्यास)अँक-२ भाग-१

एखन धरि अपने लोकनि पढलहुँ वर्षा’क अमोल आ रँजीत सँ जानपहचान. पहिने रँजीत केँ खराप बुझनाय, अमोल केँ बहुत नीक बुझनाय. ओकर बाद रँजीत’क गुण’क विश्लेषण, रँजीत’क अपन गाम मे अपन कथा केँ ठुकरा देनाई, विमल’क मुम्बई आगमन आ हुनकर वर्षा सँ आमना सामना ओकर बाद रँजीत’क गाम पर तहलका आब आगू पढू:

रँजीत अपन परिवार’क लेल एक उद्धार्कर्ता बनल छलाह. परिवार’क प्रत्येक सदस्य केँ हुनका सँ कोनो ने कोनो अपेक्षा जरूर छलन्हि. कोनो व्यक्तिक उदार व्यक्तित्व कारणेँ दोसर व्यक्ति हुनका सँ बेसी आत्मीयता जोड़ि लैत अछि. आत्मीयता सँ सँबँध मजबूत होइत अछि. सँबँन्ध मजबूत भेला पर दोसर व्यक्ति उदार चरित्रवाला’क उपर मे अधिकार जँतबे लागैत छथि. आ अधिकार भेला पर अपेक्षा आओर बेसी बढ़ि जाइत अछि. रँजीत उदार व्यक्ति छलाह. जतेक कमबैत छलाह ओहि मे सँ बेसी सँ बेसी घर केँ पठा दैत छलाह. बाबूजी लेल अलग सँ, भौजी लेल अलग सँ, भाए लोकनिक लेल ते प्रत्येक महीना. रँजीत एखनि धरि नियमित रुप सँ पैसा मनीआर्डर करैत छलाह. ओएह पैसा सँ प्रत्येक लोकनिक कामना पूरा होइत छलन्हि. इएह पैसा सँ गाम मे हुनकर पिता आ भाए लोकनिक बाहरी खर्चा चलैत छलन्हि. खाए जोगर तऽ अनाज उपजिए जाइत छलन्हि.

रँजीत’क बारे मे पूरा बुझला’क बाद प्रत्येक लोकनि हुनका उपर मे अपन अधिकार’क प्रयोग करय चाहैत छल. अधिकार माँग यदि सँतुलित नहि हो तऽ ओहि मे विकार उत्पन्न होइत अछि. विकार सँ इर्ष्या द्वेष इत्यादि’क भावना जे पूरे सम्बन्ध केँ जड़ि सँ हिला दैत छैक. रँजीत’क परिवार’क लोक अपन अधिकार’क माँग कऽ सकैत छलैथ. ओ सीधे सीधे रँजीत सँ कहि सकैत छलैथ जे वर्षा सँ हुनकर सम्बन्ध हुनका लोकनि केँ नीक नहि लागैत छन्हि. मुदा हुनका लोकनिक रँजीत’क उपर मे अधिकार’क सोच आ कार्य सन्तुलित नहि छलन्हि. तेँ रँजीत के छोड़ि देबय चाहैत छलैथ. बल्कि रँजीत केँ अपन परिवार सँ अघोषित रुप सँ अलग कऽ देबय चाहैत छलैथ. रंजीत सँ आब ओ लोकनि कोनो तरह’क सहायता नहि लेताह. हुनका सँ एकोटा पैसा नहि लेताह, सब लोकनि मिलि इएह विचार कयलन्हि.

मुदा रँजीत के छोड़ि देने बाँकी खर्चा कोना चलत से हुनका सब केँ सोच मे दऽ देलकन्हि. रँजीत केँ मजा चखेबाक लेल ओ लोकन्हि रँजीत सँ पैसा लेनाई बँद करय चाहैत छलाह आ ओकर बाद पैसा कतय सँ आयत से बुझल नहि छलन्हि. विमल रँजीत केँ मुम्बई मे नजदीक सँ देखने छलाह. तेँ हुनका तामस बेसी छलन्हि. विवाहित छलाह आ पत्नी कतेक दिन सँ कहैत छलन्हि जे रँजीत’क उपर मे बेसी अपेक्षा नहि राखबाक लेल. ओ हुनका कहैत छलीह जे दिल्ली जा केँ कम सँ कम प्राइअवेटो नौकरी देखबाक लेल मुदा ओ रँजीत के पालनहार मानि आइ तक बात टालैत छलाह. रँजीत सँ अपेक्षाकृत बेसी तमसायल विमल आब तय कऽ नेने छलाह जे पत्नी’क बात मानबेटा मे भलाई अछि.

सब किओ मिलि आब तय कयलन्हि जे विमल आब दिल्ली जेताह आ दिल्लीए सँ रँजीत केँ चिट्ठी लिखताह जे आब ओ नौकरी करय लागल छथिन्ह तेँ हुनका आब पैसा’क कोनो जरूरत नहि. सब किओ इएह निर्णय लेलन्हि जे कोनो तरहेँ रँजीत केँ बुझि मे नहि आबय जे गाम मे हुनकर आ वर्षा’क सँबँध’क बारे मे किनको बुझल छन्हि.

जेना निर्णय भेल, विमल दिल्ली दिस विदाह भेलाह. गामक किछु लोक गुट बना केँ दिल्ली जाइत छल. ओहि गुट मे शामिल भऽ गेलाह. जेनेरल के टिकट कटा ट्रेन मे खेबा’क लेल चुड़ा मुरही लऽ दिल्ली दिस विदा भेलाह. मोन मे छलन्हि के एक दू दिन मे नौकरी भेट जेतन्हि. कोनो अनपढ़ गँवार नहि छथि. मैट्रिक सेकेन्ड डिविजन सँ पास छथि.


एहि उपन्यास’क दोसर अँक शुरु भऽ गेल अछि. पहिल अँक मे कहानी’क भूमिका बान्हल गेल छल. तेँ ओतेक इन्टेरेस्टिँग नहि छल. आब जखन वास्त्विक कहानी’क उतार चढाव होयत, वास्तविक जीवन आ मानवीय सँबँध’क तोल-मोल होयत तऽ कहानी सहजेँ नीक लागय लागत. पाठक लोकनि सँ हमर आग्रह जे टिप्पणी जरूर दी—पद्मनाभ मिश्र



दिल्ली पहुँचितहिँ दू-तीन दिन आराम करबा मे बीति गेलन्हि. ओकर बाद नौकरी ताकबा’क शुरु केलन्हि. मोन भेलन्हि दू-तीन दिन मे नौकरी तऽ भेटिए जायत. पहिने रँजीत के चिट्ठी लिखि देल जाए. रँजीत केँ एकटा नीक चिट्ठी लिखि देलाह. चिट्ठी मे उपराग नहि देने छलाह. मुदा ई साफ साफ लिखल छल जे आब हुनका रँजीत’क पैसा सँ कोनो सरोकार नहिँ. आब ओ खुदे नौकरी करय वाला छथि. खुदे आब ओ गाम पर प्रत्येक महीना पैसा मनीआर्डर करताह.
लोक’क कहबा’क अनुसार एकटा बायोडाटा बना लेलाह. जतय जाथि लोक पुछन्हि कतेक उमर छन्हि आ कतेक दिन’क काज’क अनुभव छन्हि. आई तक कोनो नौकरी नहि केने छलाह. तेँ अनुभव’क नाम पर शुन्य. उम्र छलन्हि पैँतिस साल. अधिकतम लोक हुनका नौकरी देबा सँ मना कऽ दैत छलन्हि. आ जे किओ दैतो छलन्हि ओ साढ़े तीन हजार टाका महीना’क दरमाहा पर. दिल्ली मे तऽ कम सँ कम पन्द्रह सय टाका एकटा रूम’क किराया मे लागि जेतन्हि. ओकर बाद की खेताह आ की गाम पर मनीआर्डर करताह. किछु जे जान पहचान के लोक छलन्हि ओ कहैत छलन्हि जे चारि हजार टाका महीना सँ कम पर नौकरी नहि करबाक चाही. ओ बहुत तरहक लोक सब सँ भेँट कयलन्हि. हुनका देखय मे भेटलन्हि जे कोना गाम’क लोक दिल्ली सँ कमा केँ एला’क बाद गाम मे भारभीस दैत छलथिन्ह आ कोना एकटा रुम मे छओ गोटे गुजर बसर करैत छथिन्ह. प्रत्येक नौकरी करय वाला व्यक्ति भोर मे घर सँ आठ बजे चलि जैथि चारि टा सोहारी खा केँ आ चारि टा सोहारी आ आलू’क भूजिया बान्हि केँ. राति’क आठ बजे फेर सँ घर वापस. होइत छलन्हि जे ई केहेन दिल्ली अछि जाहि मे लोक’क मुँह सँ एत्तेक बात सुनि चुकल छथि मुदा एत्तेक कमेबाक बादो दिन मे दालि भात तरकारी नसीब नहि होइत छन्हि. किछुए दिन मे दिल्ली जे हुनकर प्रत्येक समस्या केर समाधान करय वाला छलन्हि हुनका लेल खुदे समस्या बनि गेलन्हि. दिल्ली आयल छलाह कमेबाक लेल मुदा एखन होइत छलन्हि जे दिल्ली मे हिनकर खुदे गुजर बसर भऽ जान्हि ओएह टा काफी.

उम्हर रंजीत केँ विमल केर लिखल चिट्ठी भेटलन्हि. मालूम भेलन्हि जे विमल जे गाम मे इम्हर उम्हर भटकैत रहैत छलाह से आब दिल्ली मे कमेबाक लेल चलि गेल छलाह. भेलन्हि जे गाम मे रहि केँ विमल केँ कूपमण्डूकता धरि नेने छलन्हि. दिल्ली जा केँ दुनियाँ देखबाक भेटतन्हि तऽ दालि भात’क मोल बुझि पड़तन्हि. एतबी नहि किछुए पैसा आबि गेला सँ हुनकर अपन व्यक्तिगत परिवार’क भविष्य उज्ज्वल भऽ जेतन्हि. तेँ विमल’क ई दिल्ली जेबा’क फैसला हुनका बहुत नीक लागलन्हि. बल्कि मोन मे जे एक ठाकी चिन्ता छलन्हि ओ दूर भऽ देल छलन्हि. अति उल्लासित रँजीत विमल केँ चिट्ठी मे प्रत्यूत्तर देलथिन्ह जाहि मे ओ अपन उल्लास केँ नुका नहि सकलाह.

विमल केँ जखन ओ चिट्ठी भेटलन्हि ताबय धरि हुनका एकटा नौकरी भेट गेल छलन्हि. दरमाहा छलन्हि अढ़्तीस सय टाका प्रति मास आ ओवर टाइम अलग सँ. दिल्ली सँ निराश भेल विमल खूब ओवरटाइम करैथि. बाँकी लोक सँ सम्पर्क कटि गेल छलन्हि. दिल्ली मे एकटा पूर्ण बिहारी जीवन जीबए लागल छलाह. एहेन बिहारी जीवन जाहि मे दालि भात तरकारी केवल रवि दिनक भोजन मे भेटन्हि, एकटा रूम मे चारि टा लोक रहैत छलाह. अधिक सँ अधिक ओवर टाइम भेटबाक प्रयत्न मे रहैत छलाह.

मुदा राति मे सुतय काल मे अपन स्थिति पर खुदे दया लागय लागन्हि. अपन वर्तमान जीवन केँ अपन एक मास पहिलुका जीवन सँ तुलना करय लागैथि. कतय गाम मे भोर सुति के उठैथि चाय भेटि जान्हि ओकर बाद सात-आठ सोहारी’क जलखई भेटन्हि. दिनक खाना मे दालि भार तरकारी आ भूजिया मे कोनो भाँगठ नहि होइन्हि. समय समय पर माछो भेटि जान्हि. गाम’क एत्तेक लोक सब सँ बातचीत. एतय तेँ खाना के तऽ कोनो बाते नहि किओ एहेन लोक नहि भेटन्हि जिनका सँ पेट भरि बात करताह. मोन मे होइत छलन्हि जे हुनकर एहि नार्किक जीवन’क लेल सिर्फ रँजीत जिम्मेदार छथि. मुदा रँजीत केँ मजा चखेबा’क लेल ओ दिल्ली मे नौकरी जारी राखय चाहैत छलाह. मोन मे होइत छलन्हि जे रँजीत केँ जखन चिट्ठी भेटतन्हि तऽ बुझि मे एतन्हि जे परिवार’क सब किओ रँजीते टाक आशा पर नहि जीवैत छथि. विमल ओ सब किछु कऽ सकैत छथि जे रँजीत कऽ रहल छलाह.

मुदा रँजीत’क उल्लासित चिट्ठी जखन भेटलन्हि तऽ हुनकर प्रत्येक योजना पर पानि पड़ि गेलन्हि. सोचने छलाह जे रँजीत केँ अपरतिव लागतन्हि. ओ विमल केँ प्रत्यूत्तर लिखि कहतन्हि जे भाइजी हमरा सँ कोन गलती भेल अछि से कहु. अहाँ गाम जाउ. यदि हमर मनीआर्डर कम होइत अछि तऽ हम बेसी कऽ केँ पठाएब. हुनका होइत छलन्हि जे भऽ सकैत अछि जे रँजीत छुट्टी लऽ केँ दिल्ली आबि जैथि आ हुनका सँग कऽ केँ गाम लऽ जैथि. गाम मेँ सबसँ माफी मँगताह. मुदा स्थिति दोसरे छल. रँजीत, विमल’क एहि प्रयास सँ बहुत उल्लासित छलाह. बहुत खुश छलाह.

विमलक प्रतिक्रिया दू दिस जाति छलन्हि. बुझि मे नहि आबैत छलन्हि जे कोन बात वास्तविकता मे सत्य छलन्हि. एकटा सोच छलन्हि जे भऽ सकैत अछि जे हो न हो ओ लड़की हिनका सिखाबैत छन्हि जे विमल केँ दिल्ली गेने हुनका कपार पर सँ परिवार’क बोझ उतरि जेतन्हि. फेर दुनू लोकनि विवाह कय खुब मओज मस्ती करताह. दोसर सोच छलन्हि जे रँजीत सचमुचे बदलि गेल अछि. बम्बई जा केँ घर परिवार’क महत्व केँ बिसरि गेल छथि. आ नहुएँ नहुएँ परिवार सँ पूरे तरह सँ अलग भऽ जेताह. ओहि दुनू मे सँ कोन बात सत्य छल ताहि पर विमल निर्णय नहि लऽ पाबि रहल छलाह. कोनो एहनो आदमी नहि छलन्हि जिनका सँ ओ बात कऽ सकैत छलाह. मोन मे अटकल बात केँ उगलि सकैत छलाह. कखनो कखनो अपन कनियाँ याद आबए लागैत छलन्हि. मुदा इएह सब सोचैत सोचैत ओ सुति जाइत छलाह. आ भोर भेने हुनका फेर सँ अपन नौकरी पर जाए पड़ैत छलन्हि. नौकरी पर एत्तेक काज छलन्हि जे किछु दोसर चीज सोचबाक कोनो टाइम नहि छलन्हि. राति मे बिछाओन पर पड़ल रहैत छलाह आ रँजीत केँ कोसैत रहैत छलाह.

अंतिम फेसबुक अपडेट

लेखक: आदि यायावर मूलनाम: डा. कुमार पद्मनाभ पीयूस आफिस पहुँचि गेल छलाह. सबसँ पहिने अपन लैपटॉप खोलि फेसबुक में स्टेटस अपडेट केलाह आ ...